रविवार, 6 अप्रैल 2014

अब सोचता हूं कि मैं...........

बिन पैसे की ये मेरी सारी डिग्री बेकार है..
ऐसे एंट्री नहीं मिलेगी ये यूपी की सरकार है...
किस बात की है ये डिग्री, कोई तो अपनाता ना...
पीएचडी करने पर भी, घूस बिना चपरासी कोई बन पाता ना..
न होता इन सब का एहसास, न दुनिया के गम पर रोता..
अब सोचता हूं कि काश मैं अनपढ़ होता..
मिली नौकरी दो पैसे की, बड़ा बजट है घर का....
कैसी ये जिन्दगी यारों न रिश्वत मिलती ना तन्खाह...
जो मिलता रूखा सूखा बस उसमें खुश मैं होता...
अपनी डिग्री डिप्लोमा का यूं दिल पर बोझ न ढोता...
रात को अपने बिस्तर पर खुले मुंह मैं सोता...
अब सोचता हूं कि काश मैं अनपढ़ होता...
घूस खिलाकर अधिकारी को, सरकारी नौकर होता...
पैसा होता मेरे पास भी, सामाजिक अस्तित्व न खोता...
कर लेता कोई भी काम, शर्म ना खुद पर करता...
शिक्षा पर जो खर्च किया, बिजनेस उससे करता...
गाड़ी, बंगला खुद के होते, मांग ना किसी से करता..
अब सोचता हूं कि काश मैं अनपढ़ होता...

शुभम् शुक्ला

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