शनिवार, 10 अप्रैल 2010

क्या होगा क्रिकेट का ?????

पैसो की हो रही है बौछार....
टीमें कर रहीं हैं वार पर वार........
मोदी ने क्या दिमाग लगाया....
जो आई पी एल लेकर आया.....
अब जब ग्लोबल वार्मिंग हो रही है तो इससे हमारा खेल जगत भी अछुता नहीं रहा है.... क्योंकि अब खेल, खेल की तरह नहीं रहा.... ये एक बिजेनस बनकर रह गया है.... पैसो की भरमार हो गया है हमारा खेल जगत..... लेकिन ऐसा और खेलो की अपेक्षा क्रिकेट में ज्यादा हो रहा है.... आई पी एल ऐसा ही एक धंधा बन गया है.... पैसा कमाने की होड में केवल खिलाडी ही नहीं बल्कि बडे बडे उघोगपति भी शामिल हैं........ पैसो की मानो बारीश हो रही हो... कोई खिलाडी कैच पकडता है तो उसे उसके बदले कुछ पैसे मिलते हैं..... कोई छक्के मार रहा है तो भी उसे पैसा मिलता है..... तो खिलाडी खेल भावना से क्यूं खेले.... वो तो सिर्फ पैसो के लिए खेलेगा.... जाहिर है कि खिलाडियों को बैठने तक का पैसा मिल रहा है तो उसे क्या एतराज....... वो तो पैसे के साथ साथ खेल का भी लुत्फ उठा रहा है....... खिलाडी में खेल भावना मानो खत्म हो रहीं है और गलती उनकी भी नहीं...... बल्कि इस खेल को चलाने वाले लोगों की हैं जो इस पर अभी ध्यान नहीं दे रहें हैं.... पहले खिलाडी देश के लिए खेला करते थे.... अब स्थिती ये है कि खिलाडियों को अपने ही देश की टीम के खिलाडी के विपक्ष में खेलना पड रहा है........
और तो और इंडियन प्रीमियर लीग का ग्लैमर फिल्मी सितारों को लुभाता रहा है... लेकिन तमाशाई क्रिकेट की यह सुपरहिट लीग असल में बॉलीवुड के लिए खलनायक बनती जा रही है.... शाहरूख ख़ान, प्रीति ज़िंटा, शिल्पा शेट्टी और कैटरीना कैफ जैसे सितारों का जमघट स्टेडियम में देखने को मिलता है... लेकिन सिनेमाघर दर्शकों के लिए तरसते रह जाते हैं... हर साल होने वाले इस टूर्नामेंट के दौरान रिलीज़ होने वाली फिल्मों का हश्र देखते बनता है.... इसके चलते बड़े सितारों को अपनी फिल्मों की रिलीज़ टालनी पड़ती है, वहीं बॉलीवुड के व्यवसाय पर भी इसका बुरा असर पड़ा है.... पर सितारे तो यहीं से इतना कमा रहे है कि उन्हे और कहीं हाथ डालने की जरुरत ही नहीं है... इस साल जब से आईपीएल शुरू हुआ है तब से कोई बड़े बजट की फिल्म सिनेमा घरों में नहीं उतरी है... आलम ये है कि साजिद ख़ान की 'हाउसफुल' और रितिक रोशन की 'काइट्स' भी आईपीएल के बाद ही रिलीज़ होंगी.... विक्रम भटट की 'शापित', दिबाकर बनर्जी की 'लव, सेक्स और धोखा' औंधे मुंह गिर पडी.... अब देखना ये है कि हमारा खेल जगत कब इससे निकल पाता है..... उससे पहले कुछ भी कहना बेमतलब है.....

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

वाह री सानिया.......

सानिया हुई पराई.... चली परदेस अपने साजन के घर....
सानिया और शोएब का मामला काफी दिनों से चर्चा का विषय बना हुआ है.... भारत की टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा ने कुछ दिनों पहले सारे भारतवासियों को हिला कर रख दिया.... ये कमाल उन्होने अपने खेल से नहीं बल्कि अपने शादी का फैसला सुना कर किया.... शादी शोएब मलिक से ! पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाडी से शोएब मलिक.... हालांकि इस फैसले की भारत के देशवासियों ने कडी आलोचना की है..... शोएब पर शादी शुदा होने का भी इल्जाम था..... लेकिन इन सबसे सानिया को कोई फर्क नहीं पडा.... और बेहद बेशर्मि से उन्होने पूरी जनता को हिला कर रख दिया........ सानिया के इस रुख को देखकर सभी हैरान है...... पर मशहूर गीत है-चूड़ियाँ बनती हैं दुकानों में और जोड़ियाँ ऊपर आसमानों में...... खैर सानिया कुछ भी करे पर वो भारत पाक के रिशतों में बदलाव नहीं ला पाएंगी और उनका ये सोचना भी बडा ही शर्मसार है....... जब मती मारी जाती है......... तो कहा जाता है कि किसी को कुछ नहीं सुझता ऐसा ही सानिया के साथ हुआ है.... अब देखो सानिया को ये बात कब समझ आती है.....

सभी हुए शिकार........

जब तक देश के आंतरीक हालात नहीं सुधरते तब तक किसी और समस्या से निजात पाने के बारे में सोचना बेमानी है... ऐसे में भी हमारी सरकार नक्सलवाद को गंभीरता से नहीं ले रहा है... रोज कुछ न कुछ इस विषय के बारे में सुनने को मिलता है ....... मेरा मानना ये है कि नक्सलवाद देश का सबसे बड़ा दुश्मन है..... हमारे गृहमंत्री का कहना है कि अगले २ ३ सालो में इस समस्या से पार पा लिया जाएगा... पिछले कुछ सालो में नक्सलवाद कुछ ज्यादा ही सक्रीय हो गया है..... खासतौर पर छत्तीसगढ और झारखंड में इसने बढी तेजी से पैर पसारे हैं........ हालांकी हमारी सरकार का कहना है कि इस पर लगाम लगा ली जाएगी.... लेकिन सरकार का जैसा रवैया अभी तक रहा है उसे देख कर नहीं लगता की कुछ समाधान निकलने की उम्मीद है........कुछ लोगों का कहना है कि हथियार के बल पर नक्सल समस्या नहीं सुलझायी जा सकती बर्शते माओवादियों को बातचीत कर अपनी समस्याओं को सामने रखना चाहिए..... परन्तु अगर हम देखें तो इस मुद्दे पर हमारी सरकार ही पूरी तरह से जिम्मेदार हैं.... नासूर की तरह बढ़ती नक्सल समस्या ने देश के कई जवानों की जान ली है..... कोई महीना ऐसा नहीं बीत रहा है जिसमें नक्सली वारदात न हुई हो... चाहे वे जवान हों या फिर वहां रहने वाले आदिवासी, सब ही की जान नक्सलवादी हमलों में गई लेकिन इनकी मौत की जिम्मेदारी से सरकार अपना मुहं नहीं मोड सकती....... लेकिन सबसे पहले राज्य सरकार इसके लिए जिम्मेदार है.... प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार का काम होता है.....

देश की आम जनता का संहार

भारतीय लोकतंत्र को शरमिंदा करते भारत के ये राजनेता....... आज देश जिन समस्याओं से जूझ रहा है उनमें से... एक हमारे देश की आतंरिक बीमारी...."नक्स्लवाद" है........ आज हमारी सरकार इससे निपटने की बजाये बात के जरीए इस बीमारी का हल निकालने की सोच रही है........ कोई उन्हे समझाए की ऐसा करना क्या अपने आप को ही आधात पहुंचाना नहीं होगा..... जिस बीमारी से निपटा जा सकता है उससे बातचीत करके हल निकालने की सोचना भी अपनी कमजोरी को व्यक्त करना है... हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपनी जनता को भूल उनकी शर्तो को मानने की कोशिश की तो वो और सर पर चढ जाएंगे... बजाय उनके शर्तो को मानना इससे बहतर है कि उनको कत्म किया जाए... मेरी राय में हमारी समस्या का एक समाधान है....."गोली" हिंसा के बदले हिंसा.... नहीं तो ऐसे ही रोज हमारे जवान शहीद होते रहेगें और सरकार कहती रहेगी की हम बात से हल निकालेगें और ये बीमारी इतनी बढी हो जाएगी की एक दिन हम अपने पुराने दिनों को याद करेंगें... कभी अग्रेंजो के गुलाम थे..... फिर माओवादी के गुलाम और इस तरह मिट जाएगा भारत का अस्तीत्व........ फिर भी चलती रहेगी बात, वार्ता, बातचीत, हल...... मैं नमन करता हूं अपने देश के राजनेताओं को..........अब नहीं जागे तो कब जागोगे............. भारत की जनता कहीं फिर गुलाम न हो जाए....... छतीसगढ में हुए सैन्य हमले में हमारे देश के कई जवानो ने अपनी जान की अहुति दे दी पर हमारी सरकार चुप देखती रही..... ये सफेद पोश नकाबधारी हमारे देश और हमारी क्या रक्षा करेगें इन्हें अपनी जेब भरने से फुरसत मिली होती तो आगे कुछ सोचते भी..... इन सफेदपोशियों के लिए कुछ......
ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिरएक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!


शुभम् शुक्ला
पत्रकार