रविवार, 6 अप्रैल 2014

तुम.. कविता का तीसरा पन्ना

कैसे लिखूं दांस्तां वो दुख भरी,
हर सांस में याद आई हो तुम..
खुदा कसम खुद खो बैठा खुद को,
जज़्बात मेरे ले गई थी तुम..
याद आई रात वो प्यारी,
जिसमें पास मेरे बैठी थी तुम..
आंह भरता, करवट बदलता,
आस जिने की दे गई थी तुम..
रोता भी तो कैसे ना ज़ालिम,
मोती प्यार के छोड़ गई थी तुम..
अब न कोई गम, न खुशी है कोई,
अरमान मेरे ले गई थी तुम..
झड़ी लगी थी सावन में धुंध की,
पतझड़ में भी झूल रही थी तुम..
हर कोई है पास मेरे अब,
पास नहीं जो बस वो हो तुम..
कैसे भूल जाऊं सादगी तुम्हारी,
नगमों में तान छेड़ रही थी तुम..
खिले हैं फूल हर इक चमन में,
खिलती थी कलियां जब थी तुम..
ढुंढ रहा हर गली मैं तुमकों,
खो गई हो क्यूं कहां प्यारी तुम..
नशे में चूर था मैं जब भी,
बोतल बनकर झूम रही थी तुम..
कैसे लिखूं दांस्तां वो मेरी,
कलम मेरी छीन रही थी तुम..
आहट हुई दरवाजे पर ठक-ठक,
लगा जैसे आ गई हो तुम..
कैसे लिखूं दांस्तां वो दुख भरी,
हर सांस में याद आई हो तुम..

शुभम् शुक्ला

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