रविवार, 6 अप्रैल 2014

तुम....सातवां पन्ना

तुम....


 झरनों के संगीत में हो तुम...
नदियों के हर गीत में हो तुम...
सूरज की चाहत में पागल...
सूरजमुखी की प्रीत में हो तुम...
हां तुम! बस तुम!

मेरी सुबहो-शाम में हो तुम...
मेरे हर एक काम में हो तुम...
मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे...
ईश्वर, अल्ला, राम में हो तुम...
हां तुम! बस तुम!

जीने के हर ढंग में हो तुम...
खुशियों के हर रंग में हो तुम...
हार में हो, हर जीत में हो...
मेरी हर इक जंग में हो तुम...
हां तुम! बस तुम!


शुभम् शुक्ला

तू क्यों समझती नहीं... ये दिल है सिर्फ तेरा...

जब आंखें बंद होती हैं..

बस तू साथ होती है..
तेरी यादों के तकिए पर,
बस रात मेरी सोती है..
तू क्यों दूर है यूं मुझसे..
तूझे चाहता हूं पूरे दिल से..
सुन ले मेरी आरजू तू..
तू ही मेरी जान है..
तू ही मेरा जहान है...
तू ही है सबकुछ मेरा..
अधूरा तेरे बिना दिल ये मेरा..
तू क्यों समझती नहीं...
ये दिल है सिर्फ तेरा...

शुभम् शुक्ला

अब सोचता हूं कि मैं...........

बिन पैसे की ये मेरी सारी डिग्री बेकार है..
ऐसे एंट्री नहीं मिलेगी ये यूपी की सरकार है...
किस बात की है ये डिग्री, कोई तो अपनाता ना...
पीएचडी करने पर भी, घूस बिना चपरासी कोई बन पाता ना..
न होता इन सब का एहसास, न दुनिया के गम पर रोता..
अब सोचता हूं कि काश मैं अनपढ़ होता..
मिली नौकरी दो पैसे की, बड़ा बजट है घर का....
कैसी ये जिन्दगी यारों न रिश्वत मिलती ना तन्खाह...
जो मिलता रूखा सूखा बस उसमें खुश मैं होता...
अपनी डिग्री डिप्लोमा का यूं दिल पर बोझ न ढोता...
रात को अपने बिस्तर पर खुले मुंह मैं सोता...
अब सोचता हूं कि काश मैं अनपढ़ होता...
घूस खिलाकर अधिकारी को, सरकारी नौकर होता...
पैसा होता मेरे पास भी, सामाजिक अस्तित्व न खोता...
कर लेता कोई भी काम, शर्म ना खुद पर करता...
शिक्षा पर जो खर्च किया, बिजनेस उससे करता...
गाड़ी, बंगला खुद के होते, मांग ना किसी से करता..
अब सोचता हूं कि काश मैं अनपढ़ होता...

शुभम् शुक्ला

तुम.... तुम कविता का छठा पन्ना...

जिसे जी रहा हूं मैं वो इक अहसास हो तुम....


दुनिया की इस भीड़ में अकेला,
जिसे जी रहा वो अहसास हो तुम...
रातों को याद में तेरी रोता जो मैं,
आंसू की हर एक बूंद हो तुम...
सिसक सिसक कर मूंद ली आंखें,
उन आंखों का ख्वाब हो तुम..
जागती दुनिया में सोता मैं था,
जिस पल साथ छोड़ गई थी तुम...
खिलती सुबह की लाली पर,
ओठ मुझे देती ओढ़नी हो तुम...
डूब गई जिस लहर में कश्ती,
उस कश्ती का साहिल हो तुम...
दरिया के पानी को छु लेने दे,
हर इक बूंद हो दरिया की तुम...
चलती रहती है जिस मंजर में,
उस मंजर की साथी हो तुम...
कभी न कहना मुझे तुम प्यारी,
मेरी हर इक कमजोरी हो तुम...
खो गई किस अलबेली दुनिया मे,
मेरे इंतजार की वो शाम हो तुम...
कैसे पी लूं इन गम के आंसू को,
मेरी जीवन की तो प्यास हो तुम...
दुनिया की इस भीड़ में अकेला,
जिसे जी रहा वो अहसास हो तुम...

के तुझ बिन अधूरा हूं मै...
लौट आओ पास मेरे तुम...

शुभम् शुक्ला

तुम कविता का पांचवां पन्ना

अधूरा हूं हर पल साथ तेरे मैं
फिर भी जाने साथ नहीं तुम..
कैसे कह दूं सखी वो नटखट..
जीवन में मेरे मित्र नहीं तुम..
अलबेली सी उठी है प्यास ये मेरी..
कुआं खेत में खोज रही तुम..
मुस्कान समेटे उन गालों पर..
खिल उठे जो अरमान हो तुम..
सदियों से जीया है मैंने जिसको..
खामोशी भरी सांस हो तुम..
सोचता रहता हल पर तुमको..
सिमटी रात का ख्वाब हो तुम..
उजला जीवन क्यूं है ऐसा..
साथ होकर भी साथ नहीं तुम..
कैसी ये कसक है दिल की..
जिसमें आंह भर रही हो तुम..
उठ खड़ा हो जा रे पगले..
खेल रही हर आंगन में तुम..
भीग रहा जिस बारिश में..
बरसात की पहली बूंद हो तुम..
न पल वो ठहरा न रात वो ठहरी..
सिखुड़ती गई वो ओस हो तुम..
आज एहसास सिर्फ हुआ तुम्हारा
अधूरा हूं पर साथ नहीं हो तुम...



शुभम् शुक्ला

तुम कविता का चौथा पन्ना...

पनघट पर ओढ़ ओढ़नी,
खड़ी देख रही थी तुम..
गोपियों संग मुझको,
कान्हा सोच रही थी तुम...
कैसे नगरी आता मैं तेरी,
राह देख रही थी तुम...
सांझ ओस भरी है देखों,
बांवरी हो रही हो तुम..
होंठ सूखे पत्तों सर्दी में,
चादर सी सिकुड रही हो तुम..
चांदन सी रात वो पहरी,
शर्माई घबराई सी वो तुम..
कैसे करूं पार ये नदिया,
माझी मेरी बन गई थी तुम..
रोज लगे अब पार ये दुनिया,
सावन दूर नहीं पास हो तुम..
कैसे बतलाऊं बात वो,
सुनना चाहती हो जो तुम..
अलबेली हर इक अदा जैसी,
भोली सी बैठ गई थी तुम..
जिद न करती उस दिन देखो,
खो देती प्यार स्वप्न वो तुम..
रात हो गई जागो न प्यारी,
झील सी आंखों में मेरी तुम..
रोशन हुआ सवेरा आ जाओ,
प्यासी हर बूंद हो तुम..
इक-इक पल में सो जाओ,
बान सी आहट हो गई हो तुम..
कैसे आऊं पास मैं तेरे..
खड़ी देख जो रही हो तुम..


शुभम् शुक्ला

तुम.. कविता का तीसरा पन्ना

कैसे लिखूं दांस्तां वो दुख भरी,
हर सांस में याद आई हो तुम..
खुदा कसम खुद खो बैठा खुद को,
जज़्बात मेरे ले गई थी तुम..
याद आई रात वो प्यारी,
जिसमें पास मेरे बैठी थी तुम..
आंह भरता, करवट बदलता,
आस जिने की दे गई थी तुम..
रोता भी तो कैसे ना ज़ालिम,
मोती प्यार के छोड़ गई थी तुम..
अब न कोई गम, न खुशी है कोई,
अरमान मेरे ले गई थी तुम..
झड़ी लगी थी सावन में धुंध की,
पतझड़ में भी झूल रही थी तुम..
हर कोई है पास मेरे अब,
पास नहीं जो बस वो हो तुम..
कैसे भूल जाऊं सादगी तुम्हारी,
नगमों में तान छेड़ रही थी तुम..
खिले हैं फूल हर इक चमन में,
खिलती थी कलियां जब थी तुम..
ढुंढ रहा हर गली मैं तुमकों,
खो गई हो क्यूं कहां प्यारी तुम..
नशे में चूर था मैं जब भी,
बोतल बनकर झूम रही थी तुम..
कैसे लिखूं दांस्तां वो मेरी,
कलम मेरी छीन रही थी तुम..
आहट हुई दरवाजे पर ठक-ठक,
लगा जैसे आ गई हो तुम..
कैसे लिखूं दांस्तां वो दुख भरी,
हर सांस में याद आई हो तुम..

शुभम् शुक्ला

तुम... कविता का दूसरा पन्ना

भीग रहा था ओस मे मैं..
बरसाती बन आई थी तुम..
थम न जाए रात ये प्यारी...
साथ जिसमें चल रही थी तुम..
तन्हाई बरपी थी उस रात में..
आंह सूखी भर रही थी तुम..
रात थी, हो रहा था हल्का सवेरा..
दूर मुझसे हो रही थी तुम..
सितारे जगमगाए, हुआ रोशन समां..
पलट कर जब देख रही थी तुम..
बलखाती, इतराती, रात संवर जा..
सुबह की राह देख रही थी तुम..
लंबे केश तुम्हारे वो झरना..
जिनकी ओट में छुप रही थी तुम..
मिल जाती रात वो लंबी..
धुमिल धुआं सी न होती तुम..
भीग रहा था जिस ओस में मैं..
साथ उसे ले गई थी तुम..
लगा दो विराम जीवन पर मेरे..
कुछ नहीं जो पास नहीं हो तुम..
भीग रहा था ओस मे मैं..
बरसाती बन आई थी तुम..
 

शुभम् शुक्ला

तुम....

तुम....

October 31, 2011 at 10:30am
लम्हा लम्हा वक्त गुजरता..
पनघठ पर गीत गुनगुनाती तुम..
रोज सुनता गीत तुम्हारे..
अगर शाम होते आती तुम..
मनचली हर एक अदा तुम्हारी..
इठलाती, शर्माती तुम..
क्यूं न मदहोश हो जाऊं मैं..
खुली ज़ुल्फ लहराती तुम..
सुबह की पहली किरण है जागी
काश मुझे रोज जगाती तुम..
अलबली सी बन बैठ मुझे..
कभी हंसाती कभी रूलाती तुम..
कहानियां किस्से बहुत सुने थे..
हकीकत मुझे समझाती तुम..
वक्त न ठहरा पास मेरे वो..
ठहरी मेरे पास थी तुम..
रोज होता दिदार तुम्हारा
आयना वो छोड़ गई थी तुम..
खुद न जागा मैं उन रातों में..
मुझे जगाया जिसने वो थी तुम..
प्यार मैं करता बहुत तुम्हे था..
प्यार करती कतराती तुम...
आज भी सोचता दिल ये मेरा..
काश मेरी हो जाओ तुम..
लम्हा लम्हा वक्त गुजरता..
पनघठ पर गीत गुनगुनाती तुम..


शुभम् शुक्ला

ऑनलाइन प्यार पर मेरा 'खास' व्यंग्य गीत


आज के मंजनू और लैला का केवल एक ही रोना है..

प्यार मोहब्बत सबकुछ इनको ऑनलाइन ही होना है..

न देखें सूरत पहले, न सीरत पहचानेंगे..

न समझेंगे एक-दूजे को, न थोड़ा सा जानेंगे..

बाते-वातें मिलना-मिलाना इनका तो वीडियो चैट पर होना है

...............प्यार मोहब्बत सबकुछ इनको ऑनलाइन ही होना है...



प्यार करूं मैं तुझसे इतना, इंटरनेट भी बंद करूं..

नहीं उठाऊं फोन किसी का, एसएमएस भी चंद करूं..

तेरे प्यार में पागल मेरे सेलफोन का कोना-कोना है...

........प्यार मोहब्बत सबकुछ इनको ऑनलाइन ही होना है...



मैसेज लिखते दो मिनट, फिर थोड़ा सा वेट करें..

कभी लिखे ये लव-यू, लव-यू, कभी-कभी हेट करें..

फिर आधा घंटा बैठ के सोचें, SMILEY कैसा पिरोना है...

.........प्यार मोहब्बत सबकुछ इनको ऑनलाइन ही होना है...



सौ-सौ बार गिरा के मैनें मोबाइल फिर जोड़ा है..

फोन काटके तुमने मेरे दिल को कितना तोड़ा है..

अरे मोबाइल की बात करो, तुम दिल तो महज खिलौना है..

........प्यार मोहब्बत सबकुछ इनको ऑनलाइन ही होना है...



आज के मंजनू और लैला केवल एक ही रोना है..

प्यार मोहब्बत सबकुछ इनको ऑनलाइन ही होना है...



शुभम् शुक्ला

शादी और पत्रकारिता....अजीबो गरीब संगम

शादी और पत्रकारिता....अजीबो गरीब संगम



शादी और पत्रकारिता अजीबो गरीब संगम प्यारे,
जिसको लड़की मिल गई समझो उसके वारे न्यारे..
रिश्ता लेकर पहुंचे इक जनाब, बोले लड़का करता क्या है,
सज्जन से पिताजी बोले बेटा... पत्रकार है..
सोच में पड़े लालाजी, बोले पत्रकार से रिश्ता न कर पाऊंगा,
मांग करोगे तुम मोटी, तो दहेज कहां से लाऊंगा..
पत्रकारिता से बैर क्यों ना जाने, सुनते लालाजी खड़े हुए,
मां बोली ये पहले थोड़ी, जो पत्रकार सुन भाग खड़े हुए..
पिताजी बोले देखना, इक दिन अच्छा रिश्ता आएगा,
न जाने कब बहुरेंगे दिन और पत्रकार शादी कर पाएगा...
चिंता न कर बेटे की मां, चिंता चिता समान है,
पत्रकार की मां हूं बोली, क्या बस यही सम्मान है..
लल्लन की मां भी बनी है सास, देखो कैसे लबलबाती है,
बेटा अच्छी नौकरी करता और बहु सेक रोटी रोज खिलाती है..
पत्रकार ये कैसा पद है, समझ किसी के ना आएगा,
अब लगता शादी बेटा, कभी तू न कर पाएगा..
पत्रकार की सुनिए....
पिताजी, पत्रकार का प्यार कलम और सिद्धांत खबर है,
बेटा शादी कर ले कैसे भी, तेरी यही उमर है..
पिताजी देखो शादी तो अब मैं कर ना पाऊंगा,
पत्रकार बना हूं इसलिए, शायद कुंवारा ही मर जाऊंगा..
बेटा ना कह ऐसा, इक आस तो हमारे मन में है,
क्या करूं पिताजी, पत्रकारिता मेरे भी तन-मन है..
पत्रकार क्या बना दिया तुझको, अब हमारी नहीं सुनता तू,
जगह-जगह शहनाई बजी है, लेकिन तेरे कानों पर नहीं रेंगती जूं..
कौन करेगा शादी मुझसे बोले पत्रकार प्यारे...
जिसको मिल गई लड़की समझों उसके वारे न्यारे....

अगर आपके दिलों को छुई हो तो कमेंट जरूर कीजिएगा...
आपके प्यार के इंतजार में
शुभम् शुक्ला