रविवार, 6 अप्रैल 2014

तुम कविता का चौथा पन्ना...

पनघट पर ओढ़ ओढ़नी,
खड़ी देख रही थी तुम..
गोपियों संग मुझको,
कान्हा सोच रही थी तुम...
कैसे नगरी आता मैं तेरी,
राह देख रही थी तुम...
सांझ ओस भरी है देखों,
बांवरी हो रही हो तुम..
होंठ सूखे पत्तों सर्दी में,
चादर सी सिकुड रही हो तुम..
चांदन सी रात वो पहरी,
शर्माई घबराई सी वो तुम..
कैसे करूं पार ये नदिया,
माझी मेरी बन गई थी तुम..
रोज लगे अब पार ये दुनिया,
सावन दूर नहीं पास हो तुम..
कैसे बतलाऊं बात वो,
सुनना चाहती हो जो तुम..
अलबेली हर इक अदा जैसी,
भोली सी बैठ गई थी तुम..
जिद न करती उस दिन देखो,
खो देती प्यार स्वप्न वो तुम..
रात हो गई जागो न प्यारी,
झील सी आंखों में मेरी तुम..
रोशन हुआ सवेरा आ जाओ,
प्यासी हर बूंद हो तुम..
इक-इक पल में सो जाओ,
बान सी आहट हो गई हो तुम..
कैसे आऊं पास मैं तेरे..
खड़ी देख जो रही हो तुम..


शुभम् शुक्ला

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