शनिवार, 13 अगस्त 2016

वो आज भी अकेली है...

लीजिए आ गया मेरी नॉवेल का छोटा सा अंश आपके सामने... जल्द प्रकाशित होगी.. आप इतने इस अंश का आनंद लीजिए...पूरी पढ़ेंगे तभी आनंद आएगा..

वो आज भी अकेली है...

हॉस्पिटल के सामने एक सफेद कार आकर खड़ी हुई, उसमें से लंबे कद का नौजवान उतरा.. समीर (गुजरात का रहने वाला एक पारसी) ही वो शख्स था। उसकी नजरें उम्मीदों से भरी थीं। हाथों में सफेद फूलों का गलुदस्ता था। निगाहें शायद किसी को ढूंढ रही थीं। दिमाग कहीं कुछ सोच में था।
समीर आज अपनी पुलिस यूनिफार्म में नहीं था। और उसका मूड भी हमेशा की तरह ठीक नहीं लग रहा था। सीधे लिफ्ट के पास जाकर उसने लिफ्ट का बटन दबाया। लिफ्ट में प्रवेश कर उसने फ्लोर नं. 12 का बटन दबाया। लिफ्ट बंद होकर ऊपर की तरफ दौड़ने लगी। लिफ्ट की रफ्तार के साथ उसके दिमाग में चल रहे विचारों ने भी रफ्तार पकड़ ली...
दीवार पर खून से गोल निशान क्यों बनाया गया होगा?....

फॉरेन्सिक जांच में खून सनी का ही पाया गया?...

जरूर सनी गोल निशान बनााकर कुछ बताने की कोशिश कर रहा होगा...

खून किसने किया इसका अंदाजा शायद श्रुति को होगा...

लिफ्ट रुक गई और लिफ्ट की बेल बजी। बेल ने समीर के विचारों की श्रृंखला को तोड़ा। सामने इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले में 12 नंबर डिस्प्ले हुआ। लिफ्ट का दरवाजा खुला और समीर लिफ्ट से बाहर निकल गया। अपने लंबे-लंबे कदम से चलते हुए समीर सीधा 'बी' वार्ड में घुसा।
समीर ने एक बार अपने हाथ में पकडे़ फूलों के गुलदस्ते की ओर देखा और उसने 'बी2' रूम का दरवाजा धीरे से ख़टखटाया। थोड़ी देर तक राह देखी, लेकिन अंदर कोई भी आहट नहीं थी। उसने दरवाजा फिर से ख़टखटाया - इस बार जोर से। लेकिन, अंदर कोई हलचल नहीं थी। यह देखकर उसने अपनी उलझन भरी नजर इधर-उधर दौड़ाई। उसे अब चिंता होने लगी थी। वह दरवाजा जोर-जोर से ठोकने लगा।

क्या हुआ होगा?...

यहीं तो थी श्रुति...

आज उसे डिस्चार्ज तो नहीं करने वाले थे...

फिर .. वह कहां गई?

कुछ अनहोनी तो नहीं हुई होगी?

उसका दिल धडकने लगा। उसने फिर से आजू-बाजू देखा। वार्ड के एक कोने में काउंटर था. काउंटर पर उसे जानकारी मिल सकती है... ऐसा सोचकर वह तेजी से काउंटर की तरफ पहुंचा।
"एक्सक्यूज मी" उसने काउंटर पर बैठी नर्स का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास किया।
नर्स के लिए यह रोज का था, क्योंकि समीर की तरफ ध्यान न देते हुए वह अपने काम में व्यस्त रही।
'' 'बी2' में एक पेशंट थी... श्रुति श्रीवास्तव... कहां गई वो?... उसे डिस्चार्ज तो नहीं किया गया? ... लेकिन उसका डिस्चार्ज तो आज नहीं था ... फिर वो कहां गई? ... वहां तो कोई नहीं...'' समीर सवालों पे सवाल पूछे जा रहा था।
"एक मिनट ... एक मिनट ... कौन सा रूम कहा आपने?'" नर्स ने उसे रोकते हुए कहा।
"बी2".. समीर ने एक गहरी सास लेकर कहा..
नर्स ने एक फाइल निकाली। फाइल खोलकर 'बी2' ... बी2' ऐसा बोलते हुए उसने फाइल के इंडेक्स के ऊपर अपनी लचीली उंगली फेरी। फिर इंडेक्स में लिखा हुआ पेज नंबर निकालने के लिए उसने फाइल के कुछ पन्ने अपने एक खास अंदाज में पलटे।
"'बी2' ... मिस श्रुति श्रीवास्तव..." नर्स तसल्ली करने के लिए बोली।
" हां ...श्रुति श्रीवास्तव" समीर ने कंन्फर्म किया।
समीर उत्सुकता से उसकी तरफ देखने लगा, लेकिन नर्स एकदम शांत थी। जैसे वह समीर के सब्र का इम्तिहान ले रही हो। समीर का सब्र अब टूट रहा था। उसे गुस्सा आ रहा था।
'' सॉरी ... मिस्टर ..?" नर्स ने समीर का नाम जानने के लिए ऊपर देखा।
समीर का दिल और जोर-जोर से धड़कने लगा।
"समीर" समीर ने खुद को संभालते हुए अपना नाम बताया।
" सॉरी ... मिस्टर समीर ... सॉरी फॉर इंकन्व्हीनियंस ... श्रुति को दूसरे रूम में ... बी23 में शिफ्ट किया गया है...." नर्स बोली।
समीर की जान में जान आई...
"ऍक्चुअली ... बी2 बहुत कंजेस्टेड हो रहा था ... इसलिए उनके ही कहने पर...." नर्स अपनी सफाई दे रही थी।
लेकिन, समीर को कहा उसे सुनने की फुर्सत थी? नर्स के बोलने से पहले ही समीर वहां से तेजी से निकल गया ... बी23 की तरफ...

मंगलवार, 2 अगस्त 2016



कानून सच में अंधा है..?

महिलाओं के साथ बदसलूकी-बलात्कार जैसी घटनाओं को लेकर लगातार विरोध के स्वर, प्रशासन के मुस्तैदी संबंधी दावों और चेतना जगाने के प्रयासों के बावजूद इस दिशा में कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पा रहा है। ऐसी घटनाओं के आंकड़े बढ़ ही रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक कार से महिला और उसकी नाबालिग बच्ची को खींच कर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म इसका ताजा उदाहरण है।

पीड़िता अपने परिवार के साथ नोएडा से देर रात को चल कर अपने घर शाहजहांपुर जा रही थीं। बुलंदशहर कोतवाली देहात इलाके से जब वे गुजर रहे थे तो एक गांव के पास उनकी कार से किसी भारी चीज के टकराने की आवाज आई। उन्होंने गाड़ी रोक दी। इसी बीच करीब आधा दर्जन बदमाशों ने उन्हें घेर लिया। गाड़ी में सवार पुरुषों को पेड़ से बांधा और महिला व उसकी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस घटना के बाद कोतवाली देहात के प्रभारी को लाइन हाजिर कर दिया गया। जब भी किसी घटना से सरकार और पुलिस की किरकिरी शुरू होती है, इसी तरह किसी अधिकारी को हटा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महिलाओं के साथ ऐसे दुष्कर्म और गाड़ियों की चोरी, राहजनी, झपटमारी जैसी घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं और इन्हें रोक पाना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। युवाओं में पनपती आपराधिक वृत्ति और महिलाओं के प्रति उनके संकीर्ण और दूषित नजरिए को लेकर अनेक अध्ययन आ चुके हैं। बहुत सारी जगहों पर सामूहिक बलात्कार की घटनाएं बदले की भावना के चलते भी होती हैं, खासकर नीची कही जाने वाली जातियों की महिलाओं के साथ ऊंची जातियों के लोगों का दुष्कर्म। मगर दिल्ली के विस्तार के साथ-साथ इससे सटे इलाकों में ऐसी घटनाएं बढ़ने के पीछे बड़ी वजह गुमराह और बेरोजगार युवाओं का संगठित अपराध की तरफ आकर्षित होना है। इन्हें कैसे सही रास्ते पर लाया जाए, इसका कोई उपाय सरकार के पास नहीं है।

दिल्ली के आसपास पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के एक बड़े हिस्से में रिहायशी कालोनियां बसाने, व्यावसायिक केंद्र खोलने, सड़कों और दूसरी परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है। जो परिवार खेती-बाड़ी पर निर्भर थे, उन्होंने मुआवजे की रकम से आलीशान मकान बनवा लिए, बड़ी-बड़ी गाड़ियां खरीद लीं और महानगर की रंगीनी में रंग गए। बाजार ने उनकी ख्वाहिशें बढ़ा दीं। ऐशो-आराम की हर चीज उन्हें भाने लगी। रईसों के शौक उन्हें लुभाने लगे। संचार माध्यमों से उन्हें उन्मुक्त होने का नुस्खा हाथ लगा। पर आजीविका का साधन न होने के कारण धीरे-धीरे उन परिवारों के युवाओं में कुंठा घर करती गई और वे आसान तरीके से पैसे कमाने के रास्ते तलाशने लगे। अपराध को उन्होंने जायज जरिया मान लिया।

राहजनी, अपनी कुंठा मिटाने के लिए महिलाओं से बदसलूकी, चोरी आदि प्रवृत्तियां उनमें तेजी से पनपी हैं। जब किसी समाज का पारंपरिक पेशा छीनता है, उसका सामुदायिक जीवन नष्ट-भ्रष्ट होता है तो उसके युवाओं में ऐसी ही प्रवृत्तियां पैदा होती हैं। विकास के नाम पर जो सरकारें किसानों से जमीनें ले रही हैं, मगर उनके समुचित पुनर्वास पर ध्यान नहीं दे रही हैं, उन्हें इस मसले पर सोचने की जरूरत है। अपराध को उचित मान लेने वालों को कैसे सही रास्ते पर लाया जा सकता है, इसके लिए उपाय जुटाने की जरूरत है। यह सिर्फ किसी पुलिस अधिकारी को लाइन हाजिर कर देने से काबू में नहीं आने वाला। हमें दिखाना होगा कि हमारे देश का संविधान और कानून अभी इतना अपाहिज नहीं हुआ। लोगों को आभास दिलाना होगा...कि क्या हमारा कानून अंधा नहीं है..!