जिसे जी रहा हूं मैं वो इक अहसास हो तुम....
दुनिया की इस भीड़ में अकेला,
जिसे जी रहा वो अहसास हो तुम...
रातों को याद में तेरी रोता जो मैं,
आंसू की हर एक बूंद हो तुम...
सिसक सिसक कर मूंद ली आंखें,
उन आंखों का ख्वाब हो तुम..
जागती दुनिया में सोता मैं था,
जिस पल साथ छोड़ गई थी तुम...
खिलती सुबह की लाली पर,
ओठ मुझे देती ओढ़नी हो तुम...
डूब गई जिस लहर में कश्ती,
उस कश्ती का साहिल हो तुम...
दरिया के पानी को छु लेने दे,
हर इक बूंद हो दरिया की तुम...
चलती रहती है जिस मंजर में,
उस मंजर की साथी हो तुम...
कभी न कहना मुझे तुम प्यारी,
मेरी हर इक कमजोरी हो तुम...
खो गई किस अलबेली दुनिया मे,
मेरे इंतजार की वो शाम हो तुम...
कैसे पी लूं इन गम के आंसू को,
मेरी जीवन की तो प्यास हो तुम...
दुनिया की इस भीड़ में अकेला,
जिसे जी रहा वो अहसास हो तुम...
के तुझ बिन अधूरा हूं मै...
लौट आओ पास मेरे तुम...
शुभम् शुक्ला
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें