रविवार, 6 अप्रैल 2014

तुम... कविता का दूसरा पन्ना

भीग रहा था ओस मे मैं..
बरसाती बन आई थी तुम..
थम न जाए रात ये प्यारी...
साथ जिसमें चल रही थी तुम..
तन्हाई बरपी थी उस रात में..
आंह सूखी भर रही थी तुम..
रात थी, हो रहा था हल्का सवेरा..
दूर मुझसे हो रही थी तुम..
सितारे जगमगाए, हुआ रोशन समां..
पलट कर जब देख रही थी तुम..
बलखाती, इतराती, रात संवर जा..
सुबह की राह देख रही थी तुम..
लंबे केश तुम्हारे वो झरना..
जिनकी ओट में छुप रही थी तुम..
मिल जाती रात वो लंबी..
धुमिल धुआं सी न होती तुम..
भीग रहा था जिस ओस में मैं..
साथ उसे ले गई थी तुम..
लगा दो विराम जीवन पर मेरे..
कुछ नहीं जो पास नहीं हो तुम..
भीग रहा था ओस मे मैं..
बरसाती बन आई थी तुम..
 

शुभम् शुक्ला

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