शनिवार, 3 दिसंबर 2016

भारतीय सिनेमा और हमारा समाज !
भारतीय फिल्में आरंभ से ही एक सीमा तक भारतीय समाज का आईना रही हैं जो समाज की गतिविधियों को रेखांकित करती आई हैं चाहे वह स्वतन्त्रता संग्राम हो या विभाजन की त्रासदी या युध्द हों या फिर चम्बल के डाकुओं का आतंक या अब माफियायुग इस कथन की पुष्टि बॉम्बे, सत्या, क्या कहना जैसी फिल्में करती हैं
पिछली सदी शुरू होने से पूर्व ही जब देश अपनी स्वतन्त्रता पाने की ओर अग्रसर था और देश में राजनैतिक और सामाजिक सुधार का व्यापक दौर चल रहा था, उसी समय पारसी थियेटरों को पीछे छोडते हुए मनोरंजन के नये स्वरूप सिनेमा का सूर्योदय हुआ यह चलचित्र के नाम से जाना गया इसका प्रथम प्रदर्शन भारत में 1896 में हुआ लुमिरै भाईयों ने छह मूक फिल्मों का प्रदर्शन 7 जुलाई को बम्बई के वाटसन होटल में किया था तब से लेकर आज तक भारतीय फिल्में तकनीकी और अन्य कलात्मक सुधारों के साथ इस मुकाम पर पहुंच गई हैं
पिछले पांच दशकों की बात करें तो देखने को मिलेगा कि भारतीय सिनेमा ने शहरी दर्शकों को ही नहीं गांव के दर्शकों को भी प्रभावित किया है फिल्मी गानों को गुनगुनाने और संवादों की नकल का क्रम मुगले-आज़म, शोले और सत्या तक चल कर आज भी जारी है दक्षिण भारत की ओर नजर डालें तो देखेंगे कि वहां की जनता फिल्मी कलाकारों को भगवान स्वरूप मानकर उनकी पूजा तक करती है फिल्मी कलाकार व निर्माता समय-समय पर राज्यों व केन्द्र की राजनीति में भी सक्रिय होते रहे हैं

एक लेख में भारतीय सिनेमा और समाज के समानान्तर व परस्पर प्रभावों के बारे में प्रकाश डालना गागर में सागर भरने जैसा है
 इसके लिये मैं पहले भारतीय सिनेमा के विकास का उल्लेख करूंगा।

भारतीय सिनेमा का विकार्स ढुंडीराज गोविन्द फाल्के जो दादा साहब फाल्के के नाम से अधिक जाने जाते हैं उन्हें भारत की प्रथम स्वदेश निर्मित फीचर फिल्म राजा हरिश्चन्द्र बनाने का श्रेय जाता है
 इसी फिल्म ने भारतीय चलचित्र उद्योग को जन्म दिया 1920 की शुरूआत में हिन्दी सिनेमा धीरे-धीरे अपना नियमित आकार में पनपने लगा इसी दौरान फिल्म उद्योग कानून के दायरे में भी आ गया समय के साथ साथ कई नई फिल्म कम्पनियों एवं फिल्म निर्माताओं मसलन धीरेन गांगुली, बाबूराव पेन्टर, सचेत सिंह , चन्दुलाल शाह, आर्देशिर ईरानी और वी शान्ताराम आदि का आगमन हुआ भारत की प्रथम बोलती फिल्म  आलम आरा  इम्पीरियल फिल्म कम्पनी ने आर्देशिर ईरानी के निर्देशन में बनाई इस बोलती फिल्म ने समूचे फिल्म जगत में क्रान्ति ला दी

पिछली सदी का तीस का दशक भारतीय सिनेमा में सामाजिक विरोध के रूप में जाना जाता है
 इस समय तीन बडे-बडे बैनरों प्रभात, बम्बई टॉकीज एवं नया थियेटर ने गंभीर लेकिन मनोरंजक फिल्म दर्शकों के सभी वर्गों को ध्यान में रख कर बनाईं इस समय सामाजिक अन्याय के विरोध में अनेक फिल्में जैसे - वी शान्ताराम की दुनिया माने ना, आदमी, फ्रान्जआस्टेन की  अछूत कन्या , दामले और फतहलाल की संत तुकाराम, महबूब की बातें, एक ही रास्ता तथा औरत आदि बनीं प्रथम बार आर्देशिर ईरानी ने रंगीन फिल्म किसान कन्या बनाने का प्रयास किया दशक जिसमें द्वितीय विश्वयुध्द चल रहा था और दशक जिसमें भारत स्वतन्त्र हुआ, पूरे भारत में सिनेमाग्राफी के लिये भी अविस्मरणीय समय है कुछ यादगार फिल्में चालीस के दशक में बनीं जिनमें वी शान्ताराम की  डॉ कोटनीस की अमर कहानी, महबूब की रोटी, चेतन आनंद की नीचा नगर, उदय शंकर की कल्पना, सोहराब मोदी की सिकन्दर, 'पुकार, जेबी एच वाडिया की कोई डान्सर, एमएस वासन की चन्द्रलेखा, विजय भट्ट की  भरत मिलाप एवं रामराज्य, राजकपूर की बरसात और आग प्रमुख हैं

1952 में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह बंबई में आयोजित किया गया जिसका भारतीय सिनेमा पर गहरा प्रभाव पडा
 1955 सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली फिल्म से हिन्दी सिनेमा में नया मोड अाया जिसने भारतीय फिल्म को विश्व सिनेमा जगत से जुडने का नया रास्ता दिया भारतीय फिल्म जगत को अंतर्राष्ट्रीय पहचान तब मिली जब इस फिल्म को अभूतपूर्व देशी-विदेशी पुरस्कारों के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ मानव वृत्त चित्र के लिये केन्स पुरस्कार दिया गया हिन्दी सिनेमा में नववास्तविकतावाद का प्रभाव तब दिखा जब बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन, देवदास और मधुमती, राजकपूर की बूट पॉलिश, र्श्री420, वी शान्ताराम की  दोआँखेंबारह हाथ तथा झनक झनक पाायल बाजे एवं महबूब की मदर इण्डिया प्रदर्शित की गईपचास के दौरान पहली बार भारत-सोवियत के सहयोग से गुरूदत्त की प्यासा तथा कागज़ क़े फूल, बीआरचोपडा की कानून एवं के एअब्बास की परदेसी बनाई गईं फिल्मों का रंगीन होना और उसके बाद मनोरंजन तथा सितारों पर आधारित फिल्मों से फिल्म उद्योग में पूरा परिवर्तन आगया

साठ के दशक की शुरूआत केआसिफ की  मुगल-ए-आजम से हुई, जिसने बॉक्स-ऑफिस पर नया रिकॉर्ड बनाया
 यह ध्यान देने योग्य बात है कि इसमें रोमाटिक संगीत व अच्छी पटकथा का अच्छा समायोजन था बाद में साठ के दशक में अधिकांशत: सामान्य दर्जे की फिल्में बनीं किन्तु वे भी तत्कालीन भारतीय समाज के चित्र अवश्य प्रस्तुत करती थीं और समाज से प्रभावित भी होतीं थीं राजकपूर की जिस देश में गंगा बहती है, संगम, दिलीप कुमार की गंगा-जमुना, गुरूदत्त की  साहिब बीबी और गुलाम , देव आनन्द की गाईड बिमल रॉय की बन्दिनी, एस मुखर्जी की जंगली, सुनील दत्त की  मुझे जीने दो बासु भट्टाचार्य की तीसरी कसम आदि इस दशक की सामाजिक दृष्टि से उल्लेखनीय फिल्में थीं रामानन्द सागर की आरज़ू, प्रमोद चक्रवर्ती की लव इन टोकियो, शक्ति सामन्त की आराधना, ॠषिकेश मुखर्जी की आशिर्वाद और आनन्द, बीआर चोपडा की वक्त, मनोज कुमार की उपकार, प्रसाद प्रोडक्शन की मिलन साठवें दशक के उत्तर्राध्द की बेमिसाल फिल्में थीं इनके साथ ही लोकप्रिय सिनेमा का एक नया समय आरंभ हुआ इस समय के साथ ही भारतीय समाज से फिल्मों में और फिल्मों से भारतीय समाज की ओर आधुनिकता और फैशन की लहर चल पडी महिलाओं में जागरुकता आई संगीत के क्षैत्र में साठ-सत्तर के दशकों को फिल्म संगीत का स्वर्णिम समय माना गया, उत्कृष्ट शायरों्, गीतकारों के शब्दों को संगीत के विरले कलाकारों ने सुरों का जामा पहनाया तब का संगीत आज भी अपनी लोकप्रियता में नए संगीत के आगे धूमिल नहीं हुआ है

सत्तर के दशक में मल्टीस्टार फिल्में आईं
 इस दशक की हिट फिल्में थीं कमाल अमरोही की पाकीजा, राजकपूर की बॉबी, रमेश सिप्पी की शोले नमकहराम के साथ ही अमिताभ बच्चन की फिल्मों का दौर आगया जंजीर, दीवार, खूनपसीना, कभी-कभी, अमर अकबर एन्थॉनी, मुकद्दर का सिकन्दर आदि इनके अतिरिक्त  यादों की बारात, हम किसी से कम नहीं, धर्मवीर  मेरा गांव मेरा देश आदि उल्लेखनीय रहीं इनमें से अधिकांश फिल्में एक्शन और बदले की भावना पर आधारित थीं डाकुओं के आतंक पर भी इस दशक में कई फिल्म बनींसमानान्तर सिनेमा अपनी जगह बनाने के दौर में था गोविन्द निहलानी की आक्रोश सईद मिर्जा की अलबर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है, अजीब दास्तां, मुजफ्फ़र अली की गमन आदि सत्तर के उत्तर्राध्द में बनीं श्याम बेनेगल की अंकुर इस दशक की उल्लेखनीय सार्थक फिल्म थी, किन्तु मनोरंजनप्रिय उस दौर में सार्थक सिनेमा के अन्य प्रयास खो कर रह गए

अगला दशक यानि अस्सी का दशक सार्थक सिनेमा या नए सिनेमा के आंदोलन के रूप में अपनी चरमसीमा पर था
 इस दशक में दर्शकों ने सिनेमा के इस अतिवास्तविक यथार्थ स्वरूप को सराहा हो न हो किन्तु इससे प्रभावित जरूर हुआ, बुध्दिजीवी दर्शकों का एक नया वर्ग तैयार हुआ, और इन फिल्मों को स्वीकारोक्ति मिली श्याम बेनेगल ने मंथन, भूमिका निशान्त, जूनून और त्रिकाल जैसी समाज विविध ज्वलन्त विषयों का समेटती हुई अच्छी फिल्में दर्शकों को दीं प्रकाश झा की  दामुल सहित अपर्णा सेन की 36 चौरंगी लेन, रमेश शर्मा की नई दिल्ली टाईम्स, केतन मेहता की  मिर्चमसाला, विजया मेहता की  राव साहेब, उत्पलेन्द चक्रवर्ती की  देवशिशु, प्रदीप कृश्पा की  मैसी साहब, गुलजार की इजाजत, मुजफ्फ़र अली की उमराव जान, गौतम घोष की दखल, 'पार, बुध्ददेव दासगुप्त की अन्नपूर्णा, अंधी गली और गिरीश करनाड की उत्सव, तपन सिन्हा की आज का रॉबिनहुड महेश भट्ट की पहली फिल्म अर्थ आदि नए रुझान की फिल्में थीं डाकू, कैबरे नृत्यों, मारधाड, पेडों के आगे पीछे गाना गाते हीरो-हीरोईन से उबे दर्शकों का जायका बदलने लगा था

युवा निर्देशिका मीरा नायर ने अपनी पहली फिल्म सलार्मबॉम्बे के लिए 1989 में केन्स में गोल्डन कैमरा अवार्ड जीता
 अस्सी की समाप्ति और नब्बे की शुरूआत में हिन्दी सिनेमा में कुछ लोकप्रिय फिल्मों में मि इण्डिया, तेजाब, कयामत से कयामत तक, मैंने प्यार किया,चांदनी, लम्हे, त्रिदेव, हम, घायल, जो जीता वही सिकन्दर, क्रान्तिवीर, आदि उल्लेखनीय रहीं बाद के नब्बे के दशक में रोमान्टिक प्रेम कहानियों का बोलबाला रहा, हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे बॉक्सआफिस पर बहुत हिट रहीं इस दशक में यथार्थवादी फिल्मों की दृष्टि से  द्रोहकाल, परिन्दा, दीक्षा, मायामेमसाब रूदाली, लेकिन तमन्ना बेन्डिट क्वीन  आदि उल्लेखनीय नाम हैं क्षैत्रीय फिल्में भी इस दौर में पीछे नहीं थीं मम्मो (बंगाली), हजार चौरासी की माँ ( बंगाली), तमिल, तेलुगू में अंजलि, रोजा और बॉम्बे का नाम लिया जा सकता है इन की लोकप्रियता के कारण इन सभी फिल्मों की डबिंग हिन्दी में भी हुई

नई शताब्दि में कहो ना प्यार है, रिफ्यूजी,  फिजां आदि उल्लेखनीय फिल्में हैं, अब आगे देखिये फिल्मों को पिक्चर हॉल में देखने की लोकप्रियता के घटते , टेलीविजन की बढती लोकप्रियता और वीडीयो पायरेसी के चलते फिल्म उद्योग का भविष्य क्या होता है आगे आने वाले दशकों में


यह तो हुई भारतीय सिनेमा के विकास की कहानी
अब देखना यह है कि समय-समय पर इन फिल्मों ने हमारे समाज को कैसे प्रभावित किया है दरअसल हमेशा यह कहना कठिन होता है कि समाज और समय फिल्मों में प्रतिबिम्बित होता है या फिल्मों से समाज प्रभावित होता हैदोनों ही बातें अपनी-अपनी सीमाओं में सही हैं कहानियां कितनी भी काल्पनिक हों कहीं तो वो इसी समाज से जुडी होती हैं यही फिल्मों में भी अभिव्यक्त होता है लेकिन हां बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि फिल्मों का असर हमारे युवाओं और बच्चों पर हुआ है सकारात्मक और नकारात्मक भी किन्तु ऐसा ही असर साहित्य से भी होता है क्रान्तिकारी साहित्य ने स्वतन्त्रता संग्राम में अनेक युवाओं को प्रेरित किया था। मार्क्स के साहित्य ने भी कई कॉमरेड, नक्सलाईट खडे क़र दिये अत: हर माध्यम के अपने प्रभाव होते हैं समाज पर फिल्मों के भी हुए
नकारात्मक प्रभाव इस प्रकार सामने आए कि फिल्म एक दूजे के लिए का क्लाईमेक्स दृश्य देख कई प्रेमी युगलों ने आत्महत्या कर ली थी। यहां तक कि इस फिल्मी रोमान्स ने युवक युवतियों के मन में प्रेम और विवाह के प्रति कई असमंजस डाल दिये हैं कि वे वास्तविक वैवाहिक जीवन में सामन्जस्य नहीं कर पाते कुछ अश्लील किस्म के गीतों ने ईव-टीजींग आम कर दी है ओए-ओए, ' सैक्सी-सैक्सी मुझे लोग बोलें,  मेरी पैन्ट भी सैक्सी, आती क्या खण्डाला आदि इस सैक्सी शब्द को फिल्मों ने इतना आम कर दिया कि इसका उदाहरण मुझे पडौस ही में मिल गया मेरे पडाैस की इस म्हिला से उसके छ: वर्षीय पुत्र ने पूछ ही लिया कि मम्मी ये सैक्सी क्या होता है तो माँ ने जवाब दिया कि आकर्षक और सुन्दर लगना, और कह भी क्या सकती थी? यह बात बच्चे के मन में बैठ गई और किसी समारोह के दौरान उसने अपनी सजी-संवरी माँ को सैक्सी कह दिया आधुनिकता का यह नग्न स्वरूप भारतीय संस्कृति के खिलाफ है अभी हाल में प्रदर्शित मोहब्बतें फिल्म ने यह साबित कर दिया कि भारत के कॉलेज-सकूलों में माईक्रो मिनी स्कर्ट पहन कर बस रोमान्स की सारी हदें पार करते हैं एक और फिल्म जो हाल में प्रदर्शित हुई है आशिक इसमें निर्देशक ने न जाने क्या समझ कर भाई बहन के बीच ऐसे संवाद ठूंसे हैं कि वे भारतीय नैतिकता पर प्रश्न उठाते हैं

जैसे जैसे अपराध की पृष्ठ भूमि पर फिल्में बनती रहीं, अपराध जगत में बदलाव आया
असंतुष्ट, बेरोजगार और अकर्मण्य युवकों को यह पैसा बनाने का शॉर्टकट लगने लगा, और सब स्वयं को यंग एंग्रीमेन की तर्ज पर सही मानने लगे आए दिन आप सुनते आए होंगे कि अमुक डकैति या घटना एकदम फिल्मी अन्दाज में हुई मैं यहां यह नहीं कहना चाहता कि समाज में अपराध के बढते आंकडों के प्रति फिल्में ही जिम्मेवार हैं, लेकिन हां फिल्मों ने अपराधियों के चरित्रों को जस्टीफाई कर युवकों को एकबारगी असमंजस में जरूर डाला होगा

हिन्दी फिल्मों का बाजार जैसे-जैसे विस्तृत हुआ, देश का युवा बेरोजगार 
आँखों में सपने लेकर अपनी किस्मत आजमाने या तो प्रशिक्षण प्राप्त कर या सीधे घर से भाग कर मुम्बई आने लगे उनमें से एक दो सफल हुए, शेष लौट गए या बर्बाद हो गए युवाओं में फिल्मों में अपना कैरियर बनाने के लिए इतना आकर्षण देख फर्जी निर्माता-निर्देशकों की तथा प्रशिक्षण केन्द्रों की बाढ सी आ गई है

भारतीय सिनेमा के आरंभिक दशकों में जो फिल्में बनती थीं उनमें भारतीय संस्कृति की महक रची बसी होती थी तथा विभिन्न आयामों से भारतीयता को उभारा जाता था
 बहुत समय बाद पिछले दो वर्षों में ऐसी दो फिल्में देखी हैं जिनमें हमारी संस्कृति की झलक थी, हम दिल दे चुके सनम और हम साथ साथ हैं। हां देश के आतंकवाद पर भी कुछ अच्छी सकारात्मक हल खोजतीं फिल्में आई हैं , फिजां और मिशन कश्मीर

आज एक सफल फिल्म बनाने का मूल मन्त्र है, खूबसूरत विदेशी लोकेशनें, बडे स्टार, विदेशी धुनों पर आधारित गाने
 बीच में कुछ ऐसी फिल्में भी आईं जिनके निर्माताओं का काम था भारत की कुरीतियों, विषमताओं और विवादित मुद्दों पर फिल्म बना दर्शकों का विदेशी बाजार बनाना और घटिया लोकप्रियता हासिल करना   कामसूत्र, फायर आदि ऐसी ही फिल्में हैंकमल हासन की  हे राम  भी खासी विवादित रही

वैसे कुल मिला कर देखा जाए तो भारतीय समाज और सिनेमा दोनों ने काफी तकनीकी तरक्की कर ली है
 अब जैसे जैसे फिल्मव्यवसाय बढ रहा है फिल्मों के प्रति दर्शकों की सम्वेदनशीलता घट रही है आज हमारे युवाओं के पास विश्वभर की फिल्में देखने और जानकारी के अनेक माध्यम हैं

हाल ही की घटनाओं ने फिल्म व्यवसाय पर अनेकों प्रश्नचिन्ह लगा दिये हैं
 गुलशन कुमार की हत्या, राकेश रोशन पर हुए कातिलाना हमले, फिल्म चोरी-चोरी चुपके-चुपके के निर्माता रिजवी व प्रसिध्द फाईनेन्सर भरत शाह की माफिया सरगनाओं से सांठ-गांठ के आरोप में गिरफ्तारी, इन प्रश्नों और संदेहों को पुख्ता बनाती है कि हमारा फिल्म उद्योग माफिया की शिकस्त में बुरी तरह घिरा है

आज भारत साल में सर्वाधिक फिल्में बनाने में अग्रणी है, माना अत्याधुनिक उपकरणों, उत्कृष्ट प्रस्तुति के साथ यह नए युग में 
पहुंच चुका है, लेकिन गुणवत्ता के मामलों में भारतीय सिनेमा को और भी दूरी तय करनी है साथ ही यह तय करना है कि समाज के उत्थान में उसकी क्या भूमिका हो अन्यथा टेलीविज़न उसे पीछे छोड देगा कितना ही आधुनिक हो जाए भारत, यहां राम अभी तक नर में हैं और नारी में अभी तक सीता है

शनिवार, 13 अगस्त 2016

वो आज भी अकेली है...

लीजिए आ गया मेरी नॉवेल का छोटा सा अंश आपके सामने... जल्द प्रकाशित होगी.. आप इतने इस अंश का आनंद लीजिए...पूरी पढ़ेंगे तभी आनंद आएगा..

वो आज भी अकेली है...

हॉस्पिटल के सामने एक सफेद कार आकर खड़ी हुई, उसमें से लंबे कद का नौजवान उतरा.. समीर (गुजरात का रहने वाला एक पारसी) ही वो शख्स था। उसकी नजरें उम्मीदों से भरी थीं। हाथों में सफेद फूलों का गलुदस्ता था। निगाहें शायद किसी को ढूंढ रही थीं। दिमाग कहीं कुछ सोच में था।
समीर आज अपनी पुलिस यूनिफार्म में नहीं था। और उसका मूड भी हमेशा की तरह ठीक नहीं लग रहा था। सीधे लिफ्ट के पास जाकर उसने लिफ्ट का बटन दबाया। लिफ्ट में प्रवेश कर उसने फ्लोर नं. 12 का बटन दबाया। लिफ्ट बंद होकर ऊपर की तरफ दौड़ने लगी। लिफ्ट की रफ्तार के साथ उसके दिमाग में चल रहे विचारों ने भी रफ्तार पकड़ ली...
दीवार पर खून से गोल निशान क्यों बनाया गया होगा?....

फॉरेन्सिक जांच में खून सनी का ही पाया गया?...

जरूर सनी गोल निशान बनााकर कुछ बताने की कोशिश कर रहा होगा...

खून किसने किया इसका अंदाजा शायद श्रुति को होगा...

लिफ्ट रुक गई और लिफ्ट की बेल बजी। बेल ने समीर के विचारों की श्रृंखला को तोड़ा। सामने इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले में 12 नंबर डिस्प्ले हुआ। लिफ्ट का दरवाजा खुला और समीर लिफ्ट से बाहर निकल गया। अपने लंबे-लंबे कदम से चलते हुए समीर सीधा 'बी' वार्ड में घुसा।
समीर ने एक बार अपने हाथ में पकडे़ फूलों के गुलदस्ते की ओर देखा और उसने 'बी2' रूम का दरवाजा धीरे से ख़टखटाया। थोड़ी देर तक राह देखी, लेकिन अंदर कोई भी आहट नहीं थी। उसने दरवाजा फिर से ख़टखटाया - इस बार जोर से। लेकिन, अंदर कोई हलचल नहीं थी। यह देखकर उसने अपनी उलझन भरी नजर इधर-उधर दौड़ाई। उसे अब चिंता होने लगी थी। वह दरवाजा जोर-जोर से ठोकने लगा।

क्या हुआ होगा?...

यहीं तो थी श्रुति...

आज उसे डिस्चार्ज तो नहीं करने वाले थे...

फिर .. वह कहां गई?

कुछ अनहोनी तो नहीं हुई होगी?

उसका दिल धडकने लगा। उसने फिर से आजू-बाजू देखा। वार्ड के एक कोने में काउंटर था. काउंटर पर उसे जानकारी मिल सकती है... ऐसा सोचकर वह तेजी से काउंटर की तरफ पहुंचा।
"एक्सक्यूज मी" उसने काउंटर पर बैठी नर्स का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास किया।
नर्स के लिए यह रोज का था, क्योंकि समीर की तरफ ध्यान न देते हुए वह अपने काम में व्यस्त रही।
'' 'बी2' में एक पेशंट थी... श्रुति श्रीवास्तव... कहां गई वो?... उसे डिस्चार्ज तो नहीं किया गया? ... लेकिन उसका डिस्चार्ज तो आज नहीं था ... फिर वो कहां गई? ... वहां तो कोई नहीं...'' समीर सवालों पे सवाल पूछे जा रहा था।
"एक मिनट ... एक मिनट ... कौन सा रूम कहा आपने?'" नर्स ने उसे रोकते हुए कहा।
"बी2".. समीर ने एक गहरी सास लेकर कहा..
नर्स ने एक फाइल निकाली। फाइल खोलकर 'बी2' ... बी2' ऐसा बोलते हुए उसने फाइल के इंडेक्स के ऊपर अपनी लचीली उंगली फेरी। फिर इंडेक्स में लिखा हुआ पेज नंबर निकालने के लिए उसने फाइल के कुछ पन्ने अपने एक खास अंदाज में पलटे।
"'बी2' ... मिस श्रुति श्रीवास्तव..." नर्स तसल्ली करने के लिए बोली।
" हां ...श्रुति श्रीवास्तव" समीर ने कंन्फर्म किया।
समीर उत्सुकता से उसकी तरफ देखने लगा, लेकिन नर्स एकदम शांत थी। जैसे वह समीर के सब्र का इम्तिहान ले रही हो। समीर का सब्र अब टूट रहा था। उसे गुस्सा आ रहा था।
'' सॉरी ... मिस्टर ..?" नर्स ने समीर का नाम जानने के लिए ऊपर देखा।
समीर का दिल और जोर-जोर से धड़कने लगा।
"समीर" समीर ने खुद को संभालते हुए अपना नाम बताया।
" सॉरी ... मिस्टर समीर ... सॉरी फॉर इंकन्व्हीनियंस ... श्रुति को दूसरे रूम में ... बी23 में शिफ्ट किया गया है...." नर्स बोली।
समीर की जान में जान आई...
"ऍक्चुअली ... बी2 बहुत कंजेस्टेड हो रहा था ... इसलिए उनके ही कहने पर...." नर्स अपनी सफाई दे रही थी।
लेकिन, समीर को कहा उसे सुनने की फुर्सत थी? नर्स के बोलने से पहले ही समीर वहां से तेजी से निकल गया ... बी23 की तरफ...

मंगलवार, 2 अगस्त 2016



कानून सच में अंधा है..?

महिलाओं के साथ बदसलूकी-बलात्कार जैसी घटनाओं को लेकर लगातार विरोध के स्वर, प्रशासन के मुस्तैदी संबंधी दावों और चेतना जगाने के प्रयासों के बावजूद इस दिशा में कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पा रहा है। ऐसी घटनाओं के आंकड़े बढ़ ही रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक कार से महिला और उसकी नाबालिग बच्ची को खींच कर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म इसका ताजा उदाहरण है।

पीड़िता अपने परिवार के साथ नोएडा से देर रात को चल कर अपने घर शाहजहांपुर जा रही थीं। बुलंदशहर कोतवाली देहात इलाके से जब वे गुजर रहे थे तो एक गांव के पास उनकी कार से किसी भारी चीज के टकराने की आवाज आई। उन्होंने गाड़ी रोक दी। इसी बीच करीब आधा दर्जन बदमाशों ने उन्हें घेर लिया। गाड़ी में सवार पुरुषों को पेड़ से बांधा और महिला व उसकी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस घटना के बाद कोतवाली देहात के प्रभारी को लाइन हाजिर कर दिया गया। जब भी किसी घटना से सरकार और पुलिस की किरकिरी शुरू होती है, इसी तरह किसी अधिकारी को हटा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महिलाओं के साथ ऐसे दुष्कर्म और गाड़ियों की चोरी, राहजनी, झपटमारी जैसी घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं और इन्हें रोक पाना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। युवाओं में पनपती आपराधिक वृत्ति और महिलाओं के प्रति उनके संकीर्ण और दूषित नजरिए को लेकर अनेक अध्ययन आ चुके हैं। बहुत सारी जगहों पर सामूहिक बलात्कार की घटनाएं बदले की भावना के चलते भी होती हैं, खासकर नीची कही जाने वाली जातियों की महिलाओं के साथ ऊंची जातियों के लोगों का दुष्कर्म। मगर दिल्ली के विस्तार के साथ-साथ इससे सटे इलाकों में ऐसी घटनाएं बढ़ने के पीछे बड़ी वजह गुमराह और बेरोजगार युवाओं का संगठित अपराध की तरफ आकर्षित होना है। इन्हें कैसे सही रास्ते पर लाया जाए, इसका कोई उपाय सरकार के पास नहीं है।

दिल्ली के आसपास पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के एक बड़े हिस्से में रिहायशी कालोनियां बसाने, व्यावसायिक केंद्र खोलने, सड़कों और दूसरी परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है। जो परिवार खेती-बाड़ी पर निर्भर थे, उन्होंने मुआवजे की रकम से आलीशान मकान बनवा लिए, बड़ी-बड़ी गाड़ियां खरीद लीं और महानगर की रंगीनी में रंग गए। बाजार ने उनकी ख्वाहिशें बढ़ा दीं। ऐशो-आराम की हर चीज उन्हें भाने लगी। रईसों के शौक उन्हें लुभाने लगे। संचार माध्यमों से उन्हें उन्मुक्त होने का नुस्खा हाथ लगा। पर आजीविका का साधन न होने के कारण धीरे-धीरे उन परिवारों के युवाओं में कुंठा घर करती गई और वे आसान तरीके से पैसे कमाने के रास्ते तलाशने लगे। अपराध को उन्होंने जायज जरिया मान लिया।

राहजनी, अपनी कुंठा मिटाने के लिए महिलाओं से बदसलूकी, चोरी आदि प्रवृत्तियां उनमें तेजी से पनपी हैं। जब किसी समाज का पारंपरिक पेशा छीनता है, उसका सामुदायिक जीवन नष्ट-भ्रष्ट होता है तो उसके युवाओं में ऐसी ही प्रवृत्तियां पैदा होती हैं। विकास के नाम पर जो सरकारें किसानों से जमीनें ले रही हैं, मगर उनके समुचित पुनर्वास पर ध्यान नहीं दे रही हैं, उन्हें इस मसले पर सोचने की जरूरत है। अपराध को उचित मान लेने वालों को कैसे सही रास्ते पर लाया जा सकता है, इसके लिए उपाय जुटाने की जरूरत है। यह सिर्फ किसी पुलिस अधिकारी को लाइन हाजिर कर देने से काबू में नहीं आने वाला। हमें दिखाना होगा कि हमारे देश का संविधान और कानून अभी इतना अपाहिज नहीं हुआ। लोगों को आभास दिलाना होगा...कि क्या हमारा कानून अंधा नहीं है..!

शनिवार, 30 जुलाई 2016

 डोपिंग या साजिश !

पहलवाल नरसिंह यादव का डोप टेस्ट में फेल होना भारतीय उम्मीदों के लिए तगड़ा झटका है। इससे भारतीय खेल प्रशासन की साख पर भी सवाल उठेंगे। ब्राजील के शहर रियो द जनेरो में 5 अगस्त से शुरू हो रहे ओलिंपिक खेलों के लिए भारतीय दल में यादव का चयन पहले से विवादित था। 74 किलोग्राम वर्ग में दावा दो बार के ओलिंपिक पदक विजेता सुशील कुमार का भी था। पिछले साल लास वेगास में हुई विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर नरसिंह ने रियो का टिकट हासिल किया। मगर इससे सुशील असंतुष्ट थे। तो मामला कोर्ट में गया, हालांकि न्यायपालिका ने टीम चयन में दखल देने से इनकार कर दिया।

अब जबकि नेशनल एंटी-डोपिंग एजेंसी (नाडा) ने नरसिंह के डोप टेस्ट में फेल होने की खबर जारी की है, तो उन्होंने इस घटनाक्रम के पीछे षड्यंत्र का आरोप लगाया है। भारतीय कुश्ती संघ के कुछ सूत्र भी ऐसा शक जता रहे हैं। संकेत यह दिया गया है कि नरसिंह यादव के विरोधी तत्वों ने उन्हें टीम से बाहर कराने की चाल चली। ऐसे इल्जाम लगना किसी खिलाड़ी के डोप टेस्ट में फेल होने से भी अधिक हानिकारक एवं दुर्भाग्यपूर्ण हैं। प्रश्न है कि क्या भारतीय ओलिंपिक संघ अपने खिलाड़ियों की षड्यंत्रकारियों से रक्षा करने में अक्षम है? क्या नाडा षड्यंत्र में शामिल या उसका शिकार होता है? ऐसी धारणा बनना भी भारतीय खेलों के लिए घातक होगा। भूलना नहीं चाहिए कि रियो ओलिंपिक रूस में हुए डोपिंग घोटाले के साये में आरंभ होने जा रहा है।

वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी (वाडा) की जांच से जाहिर हुआ कि मैदान पर प्रदर्शन में इजाफे के लिए रूस में संगठित ढंग खिलाड़ियों को प्रतिबंधित दवाएं दी जाती थीं। तब इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशंस (आईएएएफ) ने रूसी एथलेटिक्स फेडरेशन को निलंबित कर दिया। नतीजतन, रियो ओलिंपिक के एथलेटिक्स मुकाबलों में रूसी खिलाड़ी अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकेंगे। वाडा ने रूस के सभी खिलाड़ियों और अधिकारियों को रियो ओलंपिक से बाहर करने की मांग की है। अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति का इस पर फैसला अभी आना है।

बहरहाल, ये साफ है कि रूसी खेल प्रशासन की विश्वसनीयता तार-तार होने की कितनी भारी कीमत वहां के खिलाड़ियों को चुकानी पड़ रही है। सबक है कि राष्ट्रीय खेल प्रशासनों की स्वच्छता और ईमानदारी बेदाग बनी रहनी चाहिए। नरसिंह यादव ने जाने-अनजाने में प्रतिबंधित दवाएं लीं, तो यह अपने आप में बुरी खबर है। इससे ओलिंपिक शुरू होने के पहले ही भारत के एक पदक की आस टूटने का खतरा पैदा हुआ है। लेकिन यदि यह सामने आया कि उनके विरोधी उन्हें फंसाने में सफल हो गए, तो यह भारतीय खेल प्रशासन के माथे पर लगा अमिट कलंक होगा। (दोनों ही स्थितियों में) दोषी कौन है, उसकी पहचान और उसकी जवाबदेही जरूर तय की जानी चाहिए।

बुधवार, 27 जुलाई 2016

डर्टी ट्रिक्स... तो ये है केजरीवाल का सच !


क्या है ये.. क्यों हाशिये पर है अपनी राजनीति, क्या राजधानी में जो हो रहा है वह सब ठीक है। बौखलाहट कहां है। ऐसे ही कुछ सवाल, हर आम आदमी(जनता) के मन मे ंहैं। मेरे भी हैं। क्या हमारी राजनीति मोदी-केजरी के बीच सिमट कर रह गई है। आम आदमी पार्टी ड्रामा कर रही है। बौखला गई है... बीजेपी तो ये ही कहती है। उधर, केजरीवाल ने तो PM पर ही हत्या कराने की आशंका जाहिर की है। राजनीति देश के हित के लिए है या फिर हत्या और आरोपों के लिए,,, समझ से परे है। 


कुछ समय पीछे चलते हैं....

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एनजीओ गिरोह 'राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी)' ने घोर सांप्रदायिक 'सांप्रदायिक और लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण अधिनियम' का ड्राफ्ट तैयार किया था। एनएसी की एक प्रमुख सदस्य अरुणा राय के साथ मिलकर अरविंद केजरीवाल ने सरकारी नौकरी में रहते हुए एनजीओ की कार्यप्रणाली समझी और फिर 'परिवर्तन' नामक एनजीओ से जुड़ गए। अरविंद लंबे अरसे तक राजस्व विभाग से छुटटी लेकर भी सरकारी तनख्वाह ले रहे थे और एनजीओ से भी वेतन उठा रहे थे, जो 'श्रीमान ईमानदार' को कानूनन भ्रष्‍टाचारी की श्रेणी में रखता है। वर्ष 2006 में 'परिवर्तन' में काम करने के दौरान ही उन्हें अमेरिकी 'फोर्ड फाउंडेशन' व 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' ने 'उभरते नेतृत्व' के लिए 'रेमॉन मेग्सेसाय' पुरस्कार दिया, जबकि उस वक्त तक अरविंद ने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिसे उभरते हुए नेतृत्व का प्रतीक माना जा सके। इसके बाद अरविंद अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ 'कबीर' से जुड़ गए, जिसका गठन इन दोनों ने मिलकर वर्ष 2005 में किया था।

अरविंद को समझने से पहले 'रेमॉन मेग्सेसाय' को समझ लीजिए! 

अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो 'सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)' अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी 'फोर्ड' द्वारा संचालित 'फोर्ड फाउंडेशन' एवं कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती रही है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति व चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारतीय अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में 'रेमॉन मेग्सेसाय' को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह 'रेमॉन मेग्सेसाय' का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। 'रेमॉन मेग्सेसाय' के जरिए फिलिपिंस की राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में करने के लिए अमेरिका ने उस जमाने में प्रचार के जरिए उनका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय 'छवि निर्माण' से लेकर उन्हें 'नॉसियोनालिस्टा पार्टी' का  उम्मीदवार बनाने और चुनाव जिताने के लिए करीब 5 मिलियन डॉलर खर्च किया था। तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन डॉउल्स की निगरानी में इस पूरी योजना को उस समय के सीआईए अधिकारी 'एडवर्ड लैंडस्ले' ने अंजाम दिया था। इसकी पुष्टि 1972 में एडवर्ड लैंडस्ले द्वारा दिए गए एक साक्षात्कार में हुई।

ठीक अरविंद केजरीवाल की ही तरह रेमॉन मेग्सेसाय की ईमानदार छवि को गढ़ा गया और 'डर्टी ट्रिक्स' के जरिए विरोधी नेता और फिलिपिंस के तत्कालीन राष्ट्रपति 'क्वायरिनो' की छवि धूमिल की गई। यह प्रचारित किया गया कि क्वायरिनो भाषण देने से पहले अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ड्रग का उपयोग करते हैं। रेमॉन मेग्सेसाय की 'गढ़ी गई ईमानदार छवि' और क्वायरिनो की 'कुप्रचारित पतित छवि' ने रेमॉन मेग्सेसाय को दो तिहाई बहुमत से जीत दिला दी और अमेरिका अपने मकसद में कामयाब रहा था। भारत में इस समय अरविंद केजरीवाल बनाम अन्य राजनीतिज्ञों की बीच अंतर दर्शाने के लिए छवि गढ़ने का जो प्रचारित खेल चल रहा है वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा अपनाए गए तरीके और प्रचार से बहुत कुछ मेल खाता है।

उन्हीं 'रेमॉन मेग्सेसाय' के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को 'फोर्ड फाउंडेशन' व 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' मिलकर अप्रैल 1957 से 'रेमॉन मेग्सेसाय' अवार्ड प्रदान कर रही है। 'आम आदमी पार्टी' के संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी व 'आम आदमी पार्टी' के विधायक मनीष सिसोदिया को भी वही 'रेमॉन मेग्सेसाय' पुरस्कार मिला है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी 'फोर्ड फाउंडेशन' के फंड से उनका एनजीओ 'कबीर' और 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' मूवमेंट खड़ा हुआ है। 

भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग! 

'फोर्ड फाउंडेशन' के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ''कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।'' यही नहीं, 'कबीर' को 'डच दूतावास' से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।

डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ 'हिवोस' के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है। इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। 'हिवोस' को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।

डच एनजीओ 'हिवोस' दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं। इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने 'पनोस' नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय 'पनोस' के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी 'पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है। कुछ समय पहले तक 'सीएनएन-आईबीएन' व 'आईबीएन-7' चैनल के प्रधान संपादक रहे राजदीप सरदेसाई 'पॉपुलेशन काउंसिल' नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही 'रॉकफेलर ब्रदर्स' करती है जो 'रेमॉन मेग्सेसाय' पुरस्कार के लिए 'फोर्ड फाउंडेशन' के साथ मिलकर फंडिंग करती है।

माना जा रहा है कि 'पनोस' और 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' की फंडिंग का ही यह कमाल था कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल 'सीएनएन-आईबीएन' व हिंदी चैनल 'आईबीएन-7' न केवल अरविंद केजरीवाल को 'गढ़ने' में सबसे आगे रहा, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को 'इंडियन ऑफ द ईयर' का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। 'इंडियन ऑफ द ईयर' के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी 'जीएमआर' भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।

'जीएमआर' के स्वामित्व वाली 'डायल' कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल की। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक 'सीएजी' ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा। इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को 'गढ़ा' है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।

'जनलोकपाल आंदोलन' से 'आम आदमी पार्टी' तक का शातिर सफर!

आरोप है कि विदेशी पुरस्कार और फंडिंग हासिल करने के बाद अमेरिकी हित में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया ने इस देश को अस्थिर करने के लिए 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' का नारा देते हुए वर्ष 2011 में 'जनलोकपाल आंदोलन' की रूप रेखा खिंची। इसके लिए सबसे पहले बाबा रामदेव का उपयोग किया गया, लेकिन रामदेव इन सभी की मंशाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ गए। स्वामी रामदेव के मना करने पर उनके मंच का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र के सीधे-साधे, लेकिन भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कई मुहीम में सफलता हासिल करने वाले अन्ना हजारे को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से उत्तर भारत में 'लॉन्च' कर दिया। अन्ना हजारे को अरिवंद केजरीवाल की मंशा समझने में काफी वक्त लगा, लेकिन तब तक जनलोकपाल आंदोलन के बहाने अरविंद 'कांग्रेस पार्टी व विदेशी फंडेड मीडिया' के जरिए देश में प्रमुख चेहरा बन चुके थे। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान जो मीडिया अन्ना-अन्ना की गाथा गा रही थी, 'आम आदमी पार्टी' के गठन के बाद वही मीडिया अन्ना को असफल साबित करने और अरविंद केजरीवाल के महिमा मंडन में जुट गई।

विदेशी फंडिंग तो अंदरूनी जानकारी है, लेकिन उस दौर से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने वाली हर मीडिया संस्थान और पत्रकारों के चेहरे को गौर से देखिए। इनमें से अधिकांश वो हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा अंजाम दिए गए 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम, 1 लाख 86 हजार करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन, 70 हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ गेम्स और 'कैश फॉर वोट' घोटाले में समान रूप से भागीदार हैं।  

आगे बढ़ते हैं...! 
अन्ना जब अरविंद और मनीष सिसोदिया के पीछे की विदेशी फंडिंग और उनकी छुपी हुई मंशा से परिचित हुए तो वह अलग हो गए, लेकिन इसी अन्ना के कंधे पर पैर रखकर अरविंद अपनी 'आम आदमी पार्टी' खड़ा करने में सफल रहे। जनलोकपाल आंदोलन के पीछे 'फोर्ड फाउंडेशन' के फंड  को लेकर जब सवाल उठने लगा तो अरविंद-मनीष के आग्रह व न्यूयॉर्क स्थित अपने मुख्यालय के आदेश पर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट से 'कबीर' व उसकी फंडिंग का पूरा ब्यौरा ही हटा दिया।  लेकिन उससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 2011 में ही फोर्ड के प्रतिनिधि स्टीवेन सॉलनिक ने 'बिजनस स्टैंडर' अखबार में एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें यह कबूल किया था कि फोर्ड फाउंडेशन ने 'कबीर' को दो बार में 3 लाख 69 हजार डॉलर की फंडिंग की है। स्टीवेन सॉलनिक के इस साक्षात्कार के कारण यह मामला पूरी तरह से दबने से बच गया और अरविंद का चेहरा कम संख्या में ही सही, लेकिन लोगों के सामने आ गया।

अमेरिका की एक अन्य संस्था 'आवाज' की ओर से भी अरविंद केजरीवाल को जनलोकपाल आंदोलन के लिए फंड उपलब्ध कराया गया था और इसी 'आवाज' ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अरविंद केजरीवाल की 'आम आदमी पार्टी' को फंड उपलब्ध कराया। सीरिया, इजिप्ट, लीबिया आदि देश में सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिका की इसी 'आवाज' संस्था ने वहां के एनजीओ, ट्रस्ट व बुद्धिजीवियों को जमकर फंडिंग की थी। इससे इस विवाद को बल मिलता है कि अमेरिका के हित में हर देश की पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी संस्था जिस 'फंडिंग का खेल' खेल खेलती आई हैं, भारत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 'आम आदमी पार्टी' उसी की देन हैं।

सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के एनजीओ व उनकी 'आम आदमी पार्टी' में चुनावी चंदे के रूप में आए विदेशी फंडिंग की पूरी जांच के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। अदालत ने इसकी जांच का निर्देश दे रखा है, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय इसकी जांच कराने के प्रति उदासीनता बरत रही है, जो केंद्र सरकार को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं कि 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010' के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उस राशि को खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना भी जरूरी है। कोई भी विदेशी देश चुनावी चंदे या फंड के जरिए भारत की संप्रभुता व राजनैतिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर सके, इसलिए यह कानूनी प्रावधान किया गया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल व उनकी टीम ने इसका पूरी तरह से उल्लंघन किया है। बाबा रामदेव के खिलाफ एक ही दिन में 80 से अधिक मुकदमे दर्ज करने वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता दर्शाती है कि अरविंद केजरीवाल को वह अपने राजनैतिक फायदे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

अमेरिकी 'कल्चरल कोल्ड वार' के हथियार हैं अरविंद केजरीवाल!

फंडिंग के जरिए पूरी दुनिया में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की अमेरिका व उसकी खुफिया एजेंसी 'सीआईए' की नीति को 'कल्चरल कोल्ड वार' का नाम दिया गया है। इसमें किसी देश की राजनीति, संस्कृति  व उसके लोकतंत्र को अपने वित्त व पुरस्कार पोषित समूह, एनजीओ, ट्रस्ट, सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि, मीडिया और वामपंथी बुद्धिजीवियों के जरिए पूरी तरह से प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। अरविंद केजरीवाल ने 'सेक्यूलरिज्म' के नाम पर इसकी पहली झलक अन्ना के मंच से 'भारत माता' की तस्वीर को हटाकर दे दिया था। चूंकि इस देश में भारत माता के अपमान को 'सेक्यूलरिज्म का फैशनेबल बुर्का' समझा जाता है, इसलिए वामपंथी बुद्धिजीवी व मीडिया बिरादरी इसे अरविंद केजरीवाल की धर्मनिरपेक्षता साबित करने में सफल रही।  एक बार जो धर्मनिरपेक्षता का गंदा खेल शुरू हुआ तो फिर चल निकला और 'आम आदमी पार्टी' के नेता प्रशांत भूषण ने तत्काल कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का सुझाव दे दिया। प्रशांत भूषण यहीं नहीं रुके, उन्होंने संसद हमले के मुख्य दोषी अफजल गुरु की फांसी का विरोध करते हुए यह तक कह दिया कि इससे भारत का असली चेहरा उजागर हो गया है। जैसे वह खुद भारत नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के नागरिक हों?

प्रशांत भूषण लगातार भारत विरोधी बयान देते चले गए और मीडिया व वामपंथी बुद्धिजीवी उनकी आम आदमी पार्टी को 'क्रांतिकारी सेक्यूलर दल' के रूप में प्रचारित करने लगी।  प्रशांत भूषण को हौसला मिला और उन्होंने केंद्र सरकार से कश्मीर में लागू एएफएसपीए कानून को हटाने की मांग करते हुए कह दिया कि सेना ने कश्मीरियों को इस कानून के जरिए दबा रखा है। इसके उलट हमारी सेना यह कह चुकी है कि यदि इस कानून को हटाया जाता है तो अलगाववादी कश्मीर में हावी हो जाएंगे।

अमेरिका का हित इसमें है कि कश्मीर अस्थिर रहे या पूरी तरह से पाकिस्तान के पाले में चला जाए ताकि अमेरिका यहां अपना सैन्य व निगरानी केंद्र स्थापित कर सके।  यहां से दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्वी एशिया व चीन पर नजर रखने में उसे आसानी होगी। आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण अपनी झूठी मानवाधिकारवादी छवि व वकालत के जरिए इसकी कोशिश पहले से ही करते रहे हैं और अब जब उनकी 'अपनी राजनैतिक पार्टी' हो गई है तो वह इसे राजनैतिक रूप से अंजाम देने में जुटे हैं। यह एक तरह से 'लिटमस टेस्ट' था, जिसके जरिए आम आदमी पार्टी 'ईमानदारी' और 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' का 'कॉकटेल' तैयार कर रही थी।

8 दिसंबर 2013 को दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतने के बाद अपनी सरकार बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा आम जनता को अधिकार देने के नाम पर जनमत संग्रह का जो नाटक खेला गया, वह काफी हद तक इस 'कॉकटेल' का ही परीक्षण है। सवाल उठने लगा है कि यदि देश में आम आदमी पार्टी की सरकार बन जाए और वह कश्मीर में जनमत संग्रह कराते हुए उसे पाकिस्तान के पक्ष में बता दे तो फिर क्या होगा?

आखिर जनमत संग्रह के नाम पर उनके 'एसएमएस कैंपेन' की पारदर्शिता ही कितनी है? अन्ना हजारे भी एसएमएस  कार्ड के नाम पर अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा की गई धोखाधड़ी का मामला उठा चुके हैं। दिल्ली के पटियाला हाउस अदालत में अन्ना व अरविंद को पक्षकार बनाते हुए एसएमएस  कार्ड के नाम पर 100 करोड़ के घोटाले का एक मुकदमा दर्ज है। इस पर अन्ना ने कहा, ''मैं इससे दुखी हूं, क्योंकि मेरे नाम पर अरविंद के द्वारा किए गए इस कार्य का कुछ भी पता नहीं है और मुझे अदालत में घसीट दिया गया है, जो मेरे लिए बेहद शर्म की बात है।''

प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और उनके 'पंजीकृत आम आदमी'  ने जब देखा कि 'भारत माता' के अपमान व कश्मीर को भारत से अलग करने जैसे वक्तव्य पर 'मीडिया-बुद्धिजीवी समर्थन का खेल' शुरू हो चुका है तो उन्होंने अपनी ईमानदारी की चासनी में कांग्रेस के छद्म सेक्यूलरवाद को मिला लिया। उनके बयान देखिए, प्रशांत भूषण ने कहा, 'इस देश में हिंदू आतंकवाद चरम पर है', तो प्रशांत के सुर में सुर मिलाते हुए अरविंद ने कहा कि 'बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था और उसमें मारे गए मुस्लिम युवा निर्दोष थे।' इससे दो कदम आगे बढ़ते हुए अरविंद केजरीवाल उत्तरप्रदेश के बरेली में दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके तौकीर रजा और जामा मस्जिद के मौलाना इमाम बुखारी से मिलकर समर्थन देने की मांग की।

याद रखिए, यही इमाम बुखरी हैं, जो खुले आम दिल्ली पुलिस को चुनौती देते हुए कह चुके हैं कि 'हां, मैं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट हूं, यदि हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करके दिखाओ।' उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर रखा है लेकिन दिल्ली पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं है कि वह जामा मस्जिद जाकर उन्हें गिरफ्तार कर सके।  वहीं तौकीर रजा का पुराना सांप्रदायिक इतिहास है। वह समय-समय पर कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के पक्ष में मुसलमानों के लिए फतवा जारी करते रहे हैं। इतना ही नहीं, वह मशहूर बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की हत्या करने वालों को ईनाम देने जैसा घोर अमानवीय फतवा भी जारी कर चुके हैं। 

नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए फेंका गया 'आखिरी पत्ता' हैं अरविंद!

दरअसल विदेश में अमेरिका, सउदी अरब व पाकिस्तान और भारत में कांग्रेस व क्षेत्रीय पाटियों की पूरी कोशिश नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने की है। मोदी न अमेरिका के हित में हैं, न सउदी अरब व पाकिस्तान के हित में और न ही कांग्रेस पार्टी व धर्मनिरेपक्षता का ढोंग करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के हित में।  मोदी के आते ही अमेरिका की एशिया केंद्रित पूरी विदेश, आर्थिक व रक्षा नीति तो प्रभावित होगी ही, देश के अंदर लूट मचाने में दशकों से जुटी हुई पार्टियों व नेताओं के लिए भी जेल यात्रा का माहौल बन जाएगा। इसलिए उसी भ्रष्‍टाचार को रोकने के नाम पर जनता का भावनात्मक दोहन करते हुए ईमानदारी की स्वनिर्मित धरातल पर 'आम आदमी पार्टी' का निर्माण कराया गया है।

दिल्ली में भ्रष्‍टाचार और कुशासन में फंसी कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की 15 वर्षीय सत्ता के विरोध में उत्पन्न लहर को भाजपा के पास सीधे जाने से रोककर और फिर उसी कांग्रेस पार्टी के सहयोग से 'आम आदमी पार्टी' की सरकार बनाने का ड्रामा रचकर अरविंद केजरीवाल ने भाजपा को रोकने की अपनी क्षमता को दर्शा दिया है। अरविंद केजरीवाल द्वारा सरकार बनाने की हामी भरते ही केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, ''भाजपा के पास 32 सीटें थी, लेकिन वो बहुमत के लिए 4 सीटों का जुगाड़ नहीं कर पाई। हमारे पास केवल 8 सीटें थीं, लेकिन हमने 28 सीटों का जुगाड़ कर लिया और सरकार भी बना ली।''

कपिल सिब्बल का यह बयान भाजपा को रोकने के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी 'आम आदमी पार्टी' को खड़ा करने में कांग्रेस की छुपी हुई भूमिका को उजागर कर देता है। वैसे भी अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित एनजीओ के लिए साथ काम कर चुके हैं। तभी तो दिसंबर-2011 में अन्ना आंदोलन को समाप्त कराने की जिम्मेवारी यूपीए सरकार ने संदीप दीक्षित को सौंपी थी। 'फोर्ड फाउंडेशन' ने अरविंद व मनीष सिसोदिया के एनजीओ को 3 लाख 69 हजार डॉलर तो संदीप दीक्षित के एनजीओ को 6 लाख 50 हजार डॉलर का फंड उपलब्ध कराया है। शुरू-शुरू में अरविंद केजरीवाल को कुछ मीडिया हाउस ने शीला-संदीप का 'ब्रेन चाइल्ड' बताया भी था, लेकिन यूपीए सरकार का इशारा पाते ही इस पूरे मामले पर खामोशी अख्तियार कर ली गई।

'आम आदमी पार्टी' व  उसके नेता अरविंद केजरीवाल की पूरी मंशा को इस पार्टी के संस्थापक सदस्य व प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण ने 'मेल टुडे' अखबार में लिखे अपने एक लेख में जाहिर भी कर दिया था, लेकिन बाद में प्रशांत-अरविंद के दबाव के कारण उन्होंने अपने ही लेख से पल्ला झाड़ लिया और 'मेल टुडे' अखबार के खिलाफ मुकदमा कर दिया। 'मेल टुडे' से जुड़े सूत्र बताते हैं कि यूपीए सरकार के एक मंत्री के फोन पर 'टुडे ग्रुप' ने भी इसे झूठ कहने में समय नहीं लगाया, लेकिन तब तक इस लेख के जरिए नरेंद्र मोदी को रोकने लिए 'कांग्रेस-केजरी' गठबंधन की समूची साजिश का पर्दाफाश हो गया। यह अलग बात है कि कम प्रसार संख्या और अंग्रेजी में होने के कारण 'मेल टुडे' के लेख से बड़ी संख्या में देश की जनता अवगत नहीं हो सकी, इसलिए उस लेख के प्रमुख हिस्से को मैं यहां जस का तस रख रहा हूं, जिसमें नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए गठित 'आम आदमी पार्टी' की असलियत का पूरा ब्यौरा है।

शांति भूषण ने इंडिया टुडे समूह के अंग्रेजी अखबार 'मेल टुडे' में लिखा था, ''अरविंद केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई से भ्रष्‍टाचार के मुद्दे पर भाजपा को भी निशाने पर ले लिया और उसे कांग्रेस के समान बता डाला। वहीं खुद वह सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम नेताओं से मिले ताकि उन मुसलमानों को अपने पक्ष में कर सकें जो बीजेपी का विरोध तो करते हैं, लेकिन कांग्रेस से उकता गए हैं।  केजरीवाल और आम आदमी पार्टी उस अन्ना हजारे के आंदोलन की देन हैं जो कांग्रेस के करप्शन और मनमोहन सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ शुरू हुआ था। लेकिन बाद में अरविंद केजरीवाल की मदद से इस पूरे आंदोलन ने अपना रुख मोड़कर बीजेपी की तरफ कर दिया, जिससे जनता कंफ्यूज हो गई और आंदोलन की धार कुंद पड़ गई।''

''आंदोलन के फ्लॉप होने के बाद भी केजरीवाल ने हार नहीं मानी। जिस राजनीति का वह कड़ा विरोध करते रहे थे, उन्होंने उसी राजनीति में आने का फैसला लिया। अन्ना इससे सहमत नहीं हुए। अन्ना की असहमति केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं की राह में रोड़ा बन गई थी। इसलिए केजरीवाल ने अन्ना को दरकिनार करते हुए 'आम आदमी पार्टी' के नाम से पार्टी बना ली और इसे दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के खिलाफ खड़ा कर दिया। केजरीवाल ने जानबूझ कर शरारतपूर्ण ढंग से नितिन गडकरी के भ्रष्‍टाचार की बात उठाई और उन्हें कांग्रेस के भ्रष्‍ट नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया ताकि खुद को ईमानदार व सेक्यूलर दिखा सकें।  एक खास वर्ग को तुष्ट करने के लिए बीजेपी का नाम खराब किया गया। वर्ना बीजेपी तो सत्ता के आसपास भी नहीं थी, ऐसे में उसके भ्रष्‍टाचार का सवाल कहां पैदा होता है?''

''बीजेपी 'आम आदमी पार्टी' को नजरअंदाज करती रही और इसका केजरीवाल ने खूब फायदा उठाया। भले ही बाहर से वह कांग्रेस के खिलाफ थे, लेकिन अंदर से चुपचाप भाजपा के खिलाफ जुटे हुए थे। केजरीवाल ने लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए इसका पूरा फायदा दिल्ली के चुनाव में उठाया और भ्रष्‍टाचार का आरोप बड़ी ही चालाकी से कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पर भी मढ़ दिया। ऐसा उन्होंने अल्पसंख्यक वोट बटोरने के लिए किया।''

''दिल्ली की कामयाबी के बाद अब अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में आने की जुगत में हैं। वह सिर्फ भ्रष्‍टाचार की बात कर रहे हैं, लेकिन गवर्नेंस का मतलब सिर्फ भ्रष्‍टाचार का खात्मा करना ही नहीं होता। कांग्रेस की कारगुजारियों की वजह से भ्रष्‍टाचार के अलावा भी कई सारी समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। खराब अर्थव्यवस्था, बढ़ती कीमतें, पड़ोसी देशों से रिश्ते और अंदरूनी लॉ एंड ऑर्डर समेत कई चुनौतियां हैं। इन सभी चुनौतियों को बिना वक्त गंवाए निबटाना होगा।''

''मनमोहन सरकार की नाकामी देश के लिए मुश्किल बन गई। नरेंद्र मोदी इसलिए लोगों की आवाज बने, क्योंकि उन्होंने इन समस्याओं से जूझने और देश का सम्मान वापस लाने का विश्वास लोगों में जगाया है। मगर केजरीवाल गवर्नेंस के व्यापक अर्थ से अनभिज्ञ हैं। केजरीवाल की प्राथमिकता देश की राजनीति को अस्थिर करना और नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करने की है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अभी तक कम वक्त बीता है, अगर मोदी दोबारा सत्ता में आते हैं, तो केजरीवाल की दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। इसलिए अब जान से मारने की धमकी का प्रचार जोर-शोर से हो रहा है।

शुभम् शुक्ला
पत्रकार

डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस पहुंचाना चाहते हैं रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन?

वाशिंगटन. अमेरिका में होने जा रहे 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए कैंपेन जोर-शोर से चल रहा है।प्रचार के दौरान दोनों ही पार्टियों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। तो वहीं दूसरी ओर इस चुनाव में अमेरिका के विरोधी रूस का नाम भी उछाला जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन इस चुनाव में अपने और रूस के दोस्त डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस पहुंचाना चाहते हैं।
पिछले हफ्ते, एक कार्यक्रम ‘संडे टॉक शो’ में डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के कैंपेन मैनेजर रोबेई मूक ने इस साजिश को आधिकारिक तौर पर बताया। उन्होंने रूस के हैकरों पर डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी (DNC) के उस मेल को लीक करने का आरोप लगाया है जिसमें ये कहा गया है कि पार्टी गुप्त तौर पर हिलेरी के विरोधी बर्नी सैंडर्स को नोमिनेशन नहीं देना चाहती थी। डीएनसी के इस ई-मेल के लीक हो जाने के बाद व्यापक तौर पर प्रतिक्रिया सामने आयी।
हालांकि, इस बात को लेकर काफी समय से संदेह किया जा रहा था। लेकिन, इस मेल को ऐसे समय पर उजागर किया गया, जब क्लीवलैंड में रिपब्लिकन कन्वेंशन का आयोजन खत्म हुआ था। इसके साथ ही, हफ्ते की आखिरी शाम को फिलाडेल्फिया में डेमोक्रेटिक पार्टी के लोग एक जगह पर भाईचारे के लिए इकट्ठा हो रहे थे।
लेकिन, उस आयोजन में सैंडर्स के कट्टर समर्थक गुस्से और विद्रोही मुद्रा में थे। पार्टी के एकजुटता की छवि में दरार साफ दिख रही थी। ऐसे में सवाल उठता है कि उस मेल के लीक का आखिर जिम्मेवार कौन है?
निश्चित तौर पर, जानकारों का कहना है कि प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इसमें रूस का ही हाथ है। उसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि क्रेमलिन का ऐसा करने का लंबा इतिहास रहा है और यूरोप की अंदरूनी राजनीति में वो लगातार दखल देता रहा है। जिस वक्त जून के मध्य में डीएनसी हैक को सार्वजनिक किया गया तो ये पता चला कि इसमें रूस के एजेंट ही मुख्य संदिग्ध थे।
क्रेमलिन ये चाहता कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत हो। इसके कई कारण हैं। सबसे पहला रूस का भू-राजनीतिक मकसद नाटो को कमजोर करना या उसे तोड़ना है और उन देशों पर फिर से नियंत्रण स्थापित करना है जो पुराने सोवियत संघ का हिस्सा रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार की तरफ से दिए गए विचार रूस के इस मकसद को पूरा करने में मदद करेगा।
डोनाल्ड ट्रंप ने ना केवल पुतिन को मजबूत और निर्णायक कह कर उनकी प्रशंसा की बल्कि इसके जवाब में रूस के राष्ट्रपति ने भी ट्रंप की तारीफ की थी।