बुधवार, 27 जुलाई 2016

डर्टी ट्रिक्स... तो ये है केजरीवाल का सच !


क्या है ये.. क्यों हाशिये पर है अपनी राजनीति, क्या राजधानी में जो हो रहा है वह सब ठीक है। बौखलाहट कहां है। ऐसे ही कुछ सवाल, हर आम आदमी(जनता) के मन मे ंहैं। मेरे भी हैं। क्या हमारी राजनीति मोदी-केजरी के बीच सिमट कर रह गई है। आम आदमी पार्टी ड्रामा कर रही है। बौखला गई है... बीजेपी तो ये ही कहती है। उधर, केजरीवाल ने तो PM पर ही हत्या कराने की आशंका जाहिर की है। राजनीति देश के हित के लिए है या फिर हत्या और आरोपों के लिए,,, समझ से परे है। 


कुछ समय पीछे चलते हैं....

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एनजीओ गिरोह 'राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी)' ने घोर सांप्रदायिक 'सांप्रदायिक और लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण अधिनियम' का ड्राफ्ट तैयार किया था। एनएसी की एक प्रमुख सदस्य अरुणा राय के साथ मिलकर अरविंद केजरीवाल ने सरकारी नौकरी में रहते हुए एनजीओ की कार्यप्रणाली समझी और फिर 'परिवर्तन' नामक एनजीओ से जुड़ गए। अरविंद लंबे अरसे तक राजस्व विभाग से छुटटी लेकर भी सरकारी तनख्वाह ले रहे थे और एनजीओ से भी वेतन उठा रहे थे, जो 'श्रीमान ईमानदार' को कानूनन भ्रष्‍टाचारी की श्रेणी में रखता है। वर्ष 2006 में 'परिवर्तन' में काम करने के दौरान ही उन्हें अमेरिकी 'फोर्ड फाउंडेशन' व 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' ने 'उभरते नेतृत्व' के लिए 'रेमॉन मेग्सेसाय' पुरस्कार दिया, जबकि उस वक्त तक अरविंद ने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिसे उभरते हुए नेतृत्व का प्रतीक माना जा सके। इसके बाद अरविंद अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ 'कबीर' से जुड़ गए, जिसका गठन इन दोनों ने मिलकर वर्ष 2005 में किया था।

अरविंद को समझने से पहले 'रेमॉन मेग्सेसाय' को समझ लीजिए! 

अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो 'सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)' अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी 'फोर्ड' द्वारा संचालित 'फोर्ड फाउंडेशन' एवं कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती रही है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति व चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारतीय अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में 'रेमॉन मेग्सेसाय' को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह 'रेमॉन मेग्सेसाय' का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। 'रेमॉन मेग्सेसाय' के जरिए फिलिपिंस की राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में करने के लिए अमेरिका ने उस जमाने में प्रचार के जरिए उनका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय 'छवि निर्माण' से लेकर उन्हें 'नॉसियोनालिस्टा पार्टी' का  उम्मीदवार बनाने और चुनाव जिताने के लिए करीब 5 मिलियन डॉलर खर्च किया था। तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन डॉउल्स की निगरानी में इस पूरी योजना को उस समय के सीआईए अधिकारी 'एडवर्ड लैंडस्ले' ने अंजाम दिया था। इसकी पुष्टि 1972 में एडवर्ड लैंडस्ले द्वारा दिए गए एक साक्षात्कार में हुई।

ठीक अरविंद केजरीवाल की ही तरह रेमॉन मेग्सेसाय की ईमानदार छवि को गढ़ा गया और 'डर्टी ट्रिक्स' के जरिए विरोधी नेता और फिलिपिंस के तत्कालीन राष्ट्रपति 'क्वायरिनो' की छवि धूमिल की गई। यह प्रचारित किया गया कि क्वायरिनो भाषण देने से पहले अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ड्रग का उपयोग करते हैं। रेमॉन मेग्सेसाय की 'गढ़ी गई ईमानदार छवि' और क्वायरिनो की 'कुप्रचारित पतित छवि' ने रेमॉन मेग्सेसाय को दो तिहाई बहुमत से जीत दिला दी और अमेरिका अपने मकसद में कामयाब रहा था। भारत में इस समय अरविंद केजरीवाल बनाम अन्य राजनीतिज्ञों की बीच अंतर दर्शाने के लिए छवि गढ़ने का जो प्रचारित खेल चल रहा है वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा अपनाए गए तरीके और प्रचार से बहुत कुछ मेल खाता है।

उन्हीं 'रेमॉन मेग्सेसाय' के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को 'फोर्ड फाउंडेशन' व 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' मिलकर अप्रैल 1957 से 'रेमॉन मेग्सेसाय' अवार्ड प्रदान कर रही है। 'आम आदमी पार्टी' के संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी व 'आम आदमी पार्टी' के विधायक मनीष सिसोदिया को भी वही 'रेमॉन मेग्सेसाय' पुरस्कार मिला है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी 'फोर्ड फाउंडेशन' के फंड से उनका एनजीओ 'कबीर' और 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' मूवमेंट खड़ा हुआ है। 

भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग! 

'फोर्ड फाउंडेशन' के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ''कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।'' यही नहीं, 'कबीर' को 'डच दूतावास' से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।

डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ 'हिवोस' के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है। इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। 'हिवोस' को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।

डच एनजीओ 'हिवोस' दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं। इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने 'पनोस' नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय 'पनोस' के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी 'पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है। कुछ समय पहले तक 'सीएनएन-आईबीएन' व 'आईबीएन-7' चैनल के प्रधान संपादक रहे राजदीप सरदेसाई 'पॉपुलेशन काउंसिल' नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही 'रॉकफेलर ब्रदर्स' करती है जो 'रेमॉन मेग्सेसाय' पुरस्कार के लिए 'फोर्ड फाउंडेशन' के साथ मिलकर फंडिंग करती है।

माना जा रहा है कि 'पनोस' और 'रॉकफेलर ब्रदर्स फंड' की फंडिंग का ही यह कमाल था कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल 'सीएनएन-आईबीएन' व हिंदी चैनल 'आईबीएन-7' न केवल अरविंद केजरीवाल को 'गढ़ने' में सबसे आगे रहा, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को 'इंडियन ऑफ द ईयर' का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। 'इंडियन ऑफ द ईयर' के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी 'जीएमआर' भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।

'जीएमआर' के स्वामित्व वाली 'डायल' कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल की। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक 'सीएजी' ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा। इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को 'गढ़ा' है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।

'जनलोकपाल आंदोलन' से 'आम आदमी पार्टी' तक का शातिर सफर!

आरोप है कि विदेशी पुरस्कार और फंडिंग हासिल करने के बाद अमेरिकी हित में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया ने इस देश को अस्थिर करने के लिए 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' का नारा देते हुए वर्ष 2011 में 'जनलोकपाल आंदोलन' की रूप रेखा खिंची। इसके लिए सबसे पहले बाबा रामदेव का उपयोग किया गया, लेकिन रामदेव इन सभी की मंशाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ गए। स्वामी रामदेव के मना करने पर उनके मंच का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र के सीधे-साधे, लेकिन भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कई मुहीम में सफलता हासिल करने वाले अन्ना हजारे को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से उत्तर भारत में 'लॉन्च' कर दिया। अन्ना हजारे को अरिवंद केजरीवाल की मंशा समझने में काफी वक्त लगा, लेकिन तब तक जनलोकपाल आंदोलन के बहाने अरविंद 'कांग्रेस पार्टी व विदेशी फंडेड मीडिया' के जरिए देश में प्रमुख चेहरा बन चुके थे। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान जो मीडिया अन्ना-अन्ना की गाथा गा रही थी, 'आम आदमी पार्टी' के गठन के बाद वही मीडिया अन्ना को असफल साबित करने और अरविंद केजरीवाल के महिमा मंडन में जुट गई।

विदेशी फंडिंग तो अंदरूनी जानकारी है, लेकिन उस दौर से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने वाली हर मीडिया संस्थान और पत्रकारों के चेहरे को गौर से देखिए। इनमें से अधिकांश वो हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा अंजाम दिए गए 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम, 1 लाख 86 हजार करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन, 70 हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ गेम्स और 'कैश फॉर वोट' घोटाले में समान रूप से भागीदार हैं।  

आगे बढ़ते हैं...! 
अन्ना जब अरविंद और मनीष सिसोदिया के पीछे की विदेशी फंडिंग और उनकी छुपी हुई मंशा से परिचित हुए तो वह अलग हो गए, लेकिन इसी अन्ना के कंधे पर पैर रखकर अरविंद अपनी 'आम आदमी पार्टी' खड़ा करने में सफल रहे। जनलोकपाल आंदोलन के पीछे 'फोर्ड फाउंडेशन' के फंड  को लेकर जब सवाल उठने लगा तो अरविंद-मनीष के आग्रह व न्यूयॉर्क स्थित अपने मुख्यालय के आदेश पर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट से 'कबीर' व उसकी फंडिंग का पूरा ब्यौरा ही हटा दिया।  लेकिन उससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 2011 में ही फोर्ड के प्रतिनिधि स्टीवेन सॉलनिक ने 'बिजनस स्टैंडर' अखबार में एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें यह कबूल किया था कि फोर्ड फाउंडेशन ने 'कबीर' को दो बार में 3 लाख 69 हजार डॉलर की फंडिंग की है। स्टीवेन सॉलनिक के इस साक्षात्कार के कारण यह मामला पूरी तरह से दबने से बच गया और अरविंद का चेहरा कम संख्या में ही सही, लेकिन लोगों के सामने आ गया।

अमेरिका की एक अन्य संस्था 'आवाज' की ओर से भी अरविंद केजरीवाल को जनलोकपाल आंदोलन के लिए फंड उपलब्ध कराया गया था और इसी 'आवाज' ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अरविंद केजरीवाल की 'आम आदमी पार्टी' को फंड उपलब्ध कराया। सीरिया, इजिप्ट, लीबिया आदि देश में सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिका की इसी 'आवाज' संस्था ने वहां के एनजीओ, ट्रस्ट व बुद्धिजीवियों को जमकर फंडिंग की थी। इससे इस विवाद को बल मिलता है कि अमेरिका के हित में हर देश की पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी संस्था जिस 'फंडिंग का खेल' खेल खेलती आई हैं, भारत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 'आम आदमी पार्टी' उसी की देन हैं।

सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के एनजीओ व उनकी 'आम आदमी पार्टी' में चुनावी चंदे के रूप में आए विदेशी फंडिंग की पूरी जांच के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। अदालत ने इसकी जांच का निर्देश दे रखा है, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय इसकी जांच कराने के प्रति उदासीनता बरत रही है, जो केंद्र सरकार को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं कि 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010' के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उस राशि को खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना भी जरूरी है। कोई भी विदेशी देश चुनावी चंदे या फंड के जरिए भारत की संप्रभुता व राजनैतिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर सके, इसलिए यह कानूनी प्रावधान किया गया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल व उनकी टीम ने इसका पूरी तरह से उल्लंघन किया है। बाबा रामदेव के खिलाफ एक ही दिन में 80 से अधिक मुकदमे दर्ज करने वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता दर्शाती है कि अरविंद केजरीवाल को वह अपने राजनैतिक फायदे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

अमेरिकी 'कल्चरल कोल्ड वार' के हथियार हैं अरविंद केजरीवाल!

फंडिंग के जरिए पूरी दुनिया में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की अमेरिका व उसकी खुफिया एजेंसी 'सीआईए' की नीति को 'कल्चरल कोल्ड वार' का नाम दिया गया है। इसमें किसी देश की राजनीति, संस्कृति  व उसके लोकतंत्र को अपने वित्त व पुरस्कार पोषित समूह, एनजीओ, ट्रस्ट, सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि, मीडिया और वामपंथी बुद्धिजीवियों के जरिए पूरी तरह से प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। अरविंद केजरीवाल ने 'सेक्यूलरिज्म' के नाम पर इसकी पहली झलक अन्ना के मंच से 'भारत माता' की तस्वीर को हटाकर दे दिया था। चूंकि इस देश में भारत माता के अपमान को 'सेक्यूलरिज्म का फैशनेबल बुर्का' समझा जाता है, इसलिए वामपंथी बुद्धिजीवी व मीडिया बिरादरी इसे अरविंद केजरीवाल की धर्मनिरपेक्षता साबित करने में सफल रही।  एक बार जो धर्मनिरपेक्षता का गंदा खेल शुरू हुआ तो फिर चल निकला और 'आम आदमी पार्टी' के नेता प्रशांत भूषण ने तत्काल कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का सुझाव दे दिया। प्रशांत भूषण यहीं नहीं रुके, उन्होंने संसद हमले के मुख्य दोषी अफजल गुरु की फांसी का विरोध करते हुए यह तक कह दिया कि इससे भारत का असली चेहरा उजागर हो गया है। जैसे वह खुद भारत नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के नागरिक हों?

प्रशांत भूषण लगातार भारत विरोधी बयान देते चले गए और मीडिया व वामपंथी बुद्धिजीवी उनकी आम आदमी पार्टी को 'क्रांतिकारी सेक्यूलर दल' के रूप में प्रचारित करने लगी।  प्रशांत भूषण को हौसला मिला और उन्होंने केंद्र सरकार से कश्मीर में लागू एएफएसपीए कानून को हटाने की मांग करते हुए कह दिया कि सेना ने कश्मीरियों को इस कानून के जरिए दबा रखा है। इसके उलट हमारी सेना यह कह चुकी है कि यदि इस कानून को हटाया जाता है तो अलगाववादी कश्मीर में हावी हो जाएंगे।

अमेरिका का हित इसमें है कि कश्मीर अस्थिर रहे या पूरी तरह से पाकिस्तान के पाले में चला जाए ताकि अमेरिका यहां अपना सैन्य व निगरानी केंद्र स्थापित कर सके।  यहां से दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्वी एशिया व चीन पर नजर रखने में उसे आसानी होगी। आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण अपनी झूठी मानवाधिकारवादी छवि व वकालत के जरिए इसकी कोशिश पहले से ही करते रहे हैं और अब जब उनकी 'अपनी राजनैतिक पार्टी' हो गई है तो वह इसे राजनैतिक रूप से अंजाम देने में जुटे हैं। यह एक तरह से 'लिटमस टेस्ट' था, जिसके जरिए आम आदमी पार्टी 'ईमानदारी' और 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' का 'कॉकटेल' तैयार कर रही थी।

8 दिसंबर 2013 को दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतने के बाद अपनी सरकार बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा आम जनता को अधिकार देने के नाम पर जनमत संग्रह का जो नाटक खेला गया, वह काफी हद तक इस 'कॉकटेल' का ही परीक्षण है। सवाल उठने लगा है कि यदि देश में आम आदमी पार्टी की सरकार बन जाए और वह कश्मीर में जनमत संग्रह कराते हुए उसे पाकिस्तान के पक्ष में बता दे तो फिर क्या होगा?

आखिर जनमत संग्रह के नाम पर उनके 'एसएमएस कैंपेन' की पारदर्शिता ही कितनी है? अन्ना हजारे भी एसएमएस  कार्ड के नाम पर अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा की गई धोखाधड़ी का मामला उठा चुके हैं। दिल्ली के पटियाला हाउस अदालत में अन्ना व अरविंद को पक्षकार बनाते हुए एसएमएस  कार्ड के नाम पर 100 करोड़ के घोटाले का एक मुकदमा दर्ज है। इस पर अन्ना ने कहा, ''मैं इससे दुखी हूं, क्योंकि मेरे नाम पर अरविंद के द्वारा किए गए इस कार्य का कुछ भी पता नहीं है और मुझे अदालत में घसीट दिया गया है, जो मेरे लिए बेहद शर्म की बात है।''

प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और उनके 'पंजीकृत आम आदमी'  ने जब देखा कि 'भारत माता' के अपमान व कश्मीर को भारत से अलग करने जैसे वक्तव्य पर 'मीडिया-बुद्धिजीवी समर्थन का खेल' शुरू हो चुका है तो उन्होंने अपनी ईमानदारी की चासनी में कांग्रेस के छद्म सेक्यूलरवाद को मिला लिया। उनके बयान देखिए, प्रशांत भूषण ने कहा, 'इस देश में हिंदू आतंकवाद चरम पर है', तो प्रशांत के सुर में सुर मिलाते हुए अरविंद ने कहा कि 'बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था और उसमें मारे गए मुस्लिम युवा निर्दोष थे।' इससे दो कदम आगे बढ़ते हुए अरविंद केजरीवाल उत्तरप्रदेश के बरेली में दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके तौकीर रजा और जामा मस्जिद के मौलाना इमाम बुखारी से मिलकर समर्थन देने की मांग की।

याद रखिए, यही इमाम बुखरी हैं, जो खुले आम दिल्ली पुलिस को चुनौती देते हुए कह चुके हैं कि 'हां, मैं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट हूं, यदि हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करके दिखाओ।' उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर रखा है लेकिन दिल्ली पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं है कि वह जामा मस्जिद जाकर उन्हें गिरफ्तार कर सके।  वहीं तौकीर रजा का पुराना सांप्रदायिक इतिहास है। वह समय-समय पर कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के पक्ष में मुसलमानों के लिए फतवा जारी करते रहे हैं। इतना ही नहीं, वह मशहूर बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की हत्या करने वालों को ईनाम देने जैसा घोर अमानवीय फतवा भी जारी कर चुके हैं। 

नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए फेंका गया 'आखिरी पत्ता' हैं अरविंद!

दरअसल विदेश में अमेरिका, सउदी अरब व पाकिस्तान और भारत में कांग्रेस व क्षेत्रीय पाटियों की पूरी कोशिश नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने की है। मोदी न अमेरिका के हित में हैं, न सउदी अरब व पाकिस्तान के हित में और न ही कांग्रेस पार्टी व धर्मनिरेपक्षता का ढोंग करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के हित में।  मोदी के आते ही अमेरिका की एशिया केंद्रित पूरी विदेश, आर्थिक व रक्षा नीति तो प्रभावित होगी ही, देश के अंदर लूट मचाने में दशकों से जुटी हुई पार्टियों व नेताओं के लिए भी जेल यात्रा का माहौल बन जाएगा। इसलिए उसी भ्रष्‍टाचार को रोकने के नाम पर जनता का भावनात्मक दोहन करते हुए ईमानदारी की स्वनिर्मित धरातल पर 'आम आदमी पार्टी' का निर्माण कराया गया है।

दिल्ली में भ्रष्‍टाचार और कुशासन में फंसी कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की 15 वर्षीय सत्ता के विरोध में उत्पन्न लहर को भाजपा के पास सीधे जाने से रोककर और फिर उसी कांग्रेस पार्टी के सहयोग से 'आम आदमी पार्टी' की सरकार बनाने का ड्रामा रचकर अरविंद केजरीवाल ने भाजपा को रोकने की अपनी क्षमता को दर्शा दिया है। अरविंद केजरीवाल द्वारा सरकार बनाने की हामी भरते ही केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, ''भाजपा के पास 32 सीटें थी, लेकिन वो बहुमत के लिए 4 सीटों का जुगाड़ नहीं कर पाई। हमारे पास केवल 8 सीटें थीं, लेकिन हमने 28 सीटों का जुगाड़ कर लिया और सरकार भी बना ली।''

कपिल सिब्बल का यह बयान भाजपा को रोकने के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी 'आम आदमी पार्टी' को खड़ा करने में कांग्रेस की छुपी हुई भूमिका को उजागर कर देता है। वैसे भी अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित एनजीओ के लिए साथ काम कर चुके हैं। तभी तो दिसंबर-2011 में अन्ना आंदोलन को समाप्त कराने की जिम्मेवारी यूपीए सरकार ने संदीप दीक्षित को सौंपी थी। 'फोर्ड फाउंडेशन' ने अरविंद व मनीष सिसोदिया के एनजीओ को 3 लाख 69 हजार डॉलर तो संदीप दीक्षित के एनजीओ को 6 लाख 50 हजार डॉलर का फंड उपलब्ध कराया है। शुरू-शुरू में अरविंद केजरीवाल को कुछ मीडिया हाउस ने शीला-संदीप का 'ब्रेन चाइल्ड' बताया भी था, लेकिन यूपीए सरकार का इशारा पाते ही इस पूरे मामले पर खामोशी अख्तियार कर ली गई।

'आम आदमी पार्टी' व  उसके नेता अरविंद केजरीवाल की पूरी मंशा को इस पार्टी के संस्थापक सदस्य व प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण ने 'मेल टुडे' अखबार में लिखे अपने एक लेख में जाहिर भी कर दिया था, लेकिन बाद में प्रशांत-अरविंद के दबाव के कारण उन्होंने अपने ही लेख से पल्ला झाड़ लिया और 'मेल टुडे' अखबार के खिलाफ मुकदमा कर दिया। 'मेल टुडे' से जुड़े सूत्र बताते हैं कि यूपीए सरकार के एक मंत्री के फोन पर 'टुडे ग्रुप' ने भी इसे झूठ कहने में समय नहीं लगाया, लेकिन तब तक इस लेख के जरिए नरेंद्र मोदी को रोकने लिए 'कांग्रेस-केजरी' गठबंधन की समूची साजिश का पर्दाफाश हो गया। यह अलग बात है कि कम प्रसार संख्या और अंग्रेजी में होने के कारण 'मेल टुडे' के लेख से बड़ी संख्या में देश की जनता अवगत नहीं हो सकी, इसलिए उस लेख के प्रमुख हिस्से को मैं यहां जस का तस रख रहा हूं, जिसमें नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए गठित 'आम आदमी पार्टी' की असलियत का पूरा ब्यौरा है।

शांति भूषण ने इंडिया टुडे समूह के अंग्रेजी अखबार 'मेल टुडे' में लिखा था, ''अरविंद केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई से भ्रष्‍टाचार के मुद्दे पर भाजपा को भी निशाने पर ले लिया और उसे कांग्रेस के समान बता डाला। वहीं खुद वह सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम नेताओं से मिले ताकि उन मुसलमानों को अपने पक्ष में कर सकें जो बीजेपी का विरोध तो करते हैं, लेकिन कांग्रेस से उकता गए हैं।  केजरीवाल और आम आदमी पार्टी उस अन्ना हजारे के आंदोलन की देन हैं जो कांग्रेस के करप्शन और मनमोहन सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ शुरू हुआ था। लेकिन बाद में अरविंद केजरीवाल की मदद से इस पूरे आंदोलन ने अपना रुख मोड़कर बीजेपी की तरफ कर दिया, जिससे जनता कंफ्यूज हो गई और आंदोलन की धार कुंद पड़ गई।''

''आंदोलन के फ्लॉप होने के बाद भी केजरीवाल ने हार नहीं मानी। जिस राजनीति का वह कड़ा विरोध करते रहे थे, उन्होंने उसी राजनीति में आने का फैसला लिया। अन्ना इससे सहमत नहीं हुए। अन्ना की असहमति केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं की राह में रोड़ा बन गई थी। इसलिए केजरीवाल ने अन्ना को दरकिनार करते हुए 'आम आदमी पार्टी' के नाम से पार्टी बना ली और इसे दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के खिलाफ खड़ा कर दिया। केजरीवाल ने जानबूझ कर शरारतपूर्ण ढंग से नितिन गडकरी के भ्रष्‍टाचार की बात उठाई और उन्हें कांग्रेस के भ्रष्‍ट नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया ताकि खुद को ईमानदार व सेक्यूलर दिखा सकें।  एक खास वर्ग को तुष्ट करने के लिए बीजेपी का नाम खराब किया गया। वर्ना बीजेपी तो सत्ता के आसपास भी नहीं थी, ऐसे में उसके भ्रष्‍टाचार का सवाल कहां पैदा होता है?''

''बीजेपी 'आम आदमी पार्टी' को नजरअंदाज करती रही और इसका केजरीवाल ने खूब फायदा उठाया। भले ही बाहर से वह कांग्रेस के खिलाफ थे, लेकिन अंदर से चुपचाप भाजपा के खिलाफ जुटे हुए थे। केजरीवाल ने लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए इसका पूरा फायदा दिल्ली के चुनाव में उठाया और भ्रष्‍टाचार का आरोप बड़ी ही चालाकी से कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पर भी मढ़ दिया। ऐसा उन्होंने अल्पसंख्यक वोट बटोरने के लिए किया।''

''दिल्ली की कामयाबी के बाद अब अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में आने की जुगत में हैं। वह सिर्फ भ्रष्‍टाचार की बात कर रहे हैं, लेकिन गवर्नेंस का मतलब सिर्फ भ्रष्‍टाचार का खात्मा करना ही नहीं होता। कांग्रेस की कारगुजारियों की वजह से भ्रष्‍टाचार के अलावा भी कई सारी समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। खराब अर्थव्यवस्था, बढ़ती कीमतें, पड़ोसी देशों से रिश्ते और अंदरूनी लॉ एंड ऑर्डर समेत कई चुनौतियां हैं। इन सभी चुनौतियों को बिना वक्त गंवाए निबटाना होगा।''

''मनमोहन सरकार की नाकामी देश के लिए मुश्किल बन गई। नरेंद्र मोदी इसलिए लोगों की आवाज बने, क्योंकि उन्होंने इन समस्याओं से जूझने और देश का सम्मान वापस लाने का विश्वास लोगों में जगाया है। मगर केजरीवाल गवर्नेंस के व्यापक अर्थ से अनभिज्ञ हैं। केजरीवाल की प्राथमिकता देश की राजनीति को अस्थिर करना और नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करने की है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अभी तक कम वक्त बीता है, अगर मोदी दोबारा सत्ता में आते हैं, तो केजरीवाल की दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। इसलिए अब जान से मारने की धमकी का प्रचार जोर-शोर से हो रहा है।

शुभम् शुक्ला
पत्रकार

डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस पहुंचाना चाहते हैं रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन?

वाशिंगटन. अमेरिका में होने जा रहे 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए कैंपेन जोर-शोर से चल रहा है।प्रचार के दौरान दोनों ही पार्टियों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। तो वहीं दूसरी ओर इस चुनाव में अमेरिका के विरोधी रूस का नाम भी उछाला जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन इस चुनाव में अपने और रूस के दोस्त डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस पहुंचाना चाहते हैं।
पिछले हफ्ते, एक कार्यक्रम ‘संडे टॉक शो’ में डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के कैंपेन मैनेजर रोबेई मूक ने इस साजिश को आधिकारिक तौर पर बताया। उन्होंने रूस के हैकरों पर डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी (DNC) के उस मेल को लीक करने का आरोप लगाया है जिसमें ये कहा गया है कि पार्टी गुप्त तौर पर हिलेरी के विरोधी बर्नी सैंडर्स को नोमिनेशन नहीं देना चाहती थी। डीएनसी के इस ई-मेल के लीक हो जाने के बाद व्यापक तौर पर प्रतिक्रिया सामने आयी।
हालांकि, इस बात को लेकर काफी समय से संदेह किया जा रहा था। लेकिन, इस मेल को ऐसे समय पर उजागर किया गया, जब क्लीवलैंड में रिपब्लिकन कन्वेंशन का आयोजन खत्म हुआ था। इसके साथ ही, हफ्ते की आखिरी शाम को फिलाडेल्फिया में डेमोक्रेटिक पार्टी के लोग एक जगह पर भाईचारे के लिए इकट्ठा हो रहे थे।
लेकिन, उस आयोजन में सैंडर्स के कट्टर समर्थक गुस्से और विद्रोही मुद्रा में थे। पार्टी के एकजुटता की छवि में दरार साफ दिख रही थी। ऐसे में सवाल उठता है कि उस मेल के लीक का आखिर जिम्मेवार कौन है?
निश्चित तौर पर, जानकारों का कहना है कि प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इसमें रूस का ही हाथ है। उसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि क्रेमलिन का ऐसा करने का लंबा इतिहास रहा है और यूरोप की अंदरूनी राजनीति में वो लगातार दखल देता रहा है। जिस वक्त जून के मध्य में डीएनसी हैक को सार्वजनिक किया गया तो ये पता चला कि इसमें रूस के एजेंट ही मुख्य संदिग्ध थे।
क्रेमलिन ये चाहता कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत हो। इसके कई कारण हैं। सबसे पहला रूस का भू-राजनीतिक मकसद नाटो को कमजोर करना या उसे तोड़ना है और उन देशों पर फिर से नियंत्रण स्थापित करना है जो पुराने सोवियत संघ का हिस्सा रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार की तरफ से दिए गए विचार रूस के इस मकसद को पूरा करने में मदद करेगा।
डोनाल्ड ट्रंप ने ना केवल पुतिन को मजबूत और निर्णायक कह कर उनकी प्रशंसा की बल्कि इसके जवाब में रूस के राष्ट्रपति ने भी ट्रंप की तारीफ की थी।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

आपकी समस्या का हर संभव समाधान

दोस्तों,

हमारी लाइफ में अक्सर समस्या होती हैं। इनमें ग्रहों की स्थिति के चलते कुछ न कुछ रोजमर्रा की जिन्दगी में लगा रहता है। क्योंकि हमारे पास जानकारी का अभाव होता इसलिए समस्या से निपटना आसान नहीं। लेकिन, अब समस्या घर बैठे निपटा सकते हैं। बस अपना सवाल कीजिए और समस्या का समाधान पाइये..

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शुक्रवार, 22 मई 2015

मैगी के नाम एक भूखे लड़के का खुला खत, पढ़िए बेहद दिलचस्प है...

डियर मैगी,

दिल दुखता है जब-जब ये सुनता हूं कि तुम बैन होने जा रही हो. आखिरी बार जब तुम्हें खाया था तो पैकेट फेंक दिया था डस्टबिन में. दिल करता है कि तुम्हारे पीले पैकेट को डस्टबिन से उठाकर सीने से लगा लूं. तुम्हारे टेस्टमेकर के चमकीले पैकेट को डायरी में छुपाकर रख लिया है. लोग गुलाब छुपाकर रखते हैं, खुशबू को बांधकर रख लेना चाहते हैं. मैं टेस्ट मेकर की खुशबू बांधकर रखना चाहता हूं.उसे सांसों के रास्ते पेट तक पहुंचाना चाहता हूं. सच कहता हूं आज तक कभी तुमसे कोई शिकायत न रही.कभी ये नहीं सोचा कि तुम दो मिनट में तैयार क्यों नही होती. समझता हूं मजबूरी तुम्हारी. वक्त लगता है. ‘मैगी’ लड़कियों सा नाम है. आज तक कोई लड़की दो मिनट में तैयार हुई है कभी? जो तुम तैयार हो जाती.


कभी इस पर अफसोस नहीं किया कि तुमने अपना वजन क्यों घटा लिया? क्यों तुम पांच से छह, दस से बारह और बीस से तेइस की हो गईं. शायद यही विकास है. विकास की कीमत चुकानी ही पड़ती है. तुम सिर्फ ब्रांड नहीं हो. जैसे निरमा, सिर्फ निरमा नहीं. कछुआ, सिर्फ कछुआ नहीं. ब्रांड नहीं हो तुम, तुम विद्रोह की जननी हो.


घर के किचन में मम्मी-बहनों-चाचियों का साम्राज्य था तो तुमने हमें किचन में घुसने का साहस दिया. हजार सालों में जो कोई नहीं कर सकता था तुमने कर दिया. दबाए-सताए और किचन से भगाए हम बेचारों के लिए तुमने किचन का रास्ता खोल दिया. वरना हमें तो बस गेंहू और गीली दाल पिसाने के काबिल समझा जाता था. किचन में घुसने को भी तब मिलता जब सिलेंडर बदलना हो. हमें झिड़का जाता था. हमें रोटियां बेलनी नहीं आती थी. नहीं पता था कैसे चावल में तीन उंगली पानी ज्यादा डालकर उसे भात बना दिया जाता है. नहीं पता था पराठों में आलू कहां से घुस जाते हैं.


फटकना-बीनना, गूंथना-बेलना, उबालना-सेंकना, तलना-छानना, ओटना-घोटना, सेराना-मोना, पुटकी देना हमें कुछ नहीं आता था. हमें बस आग लगानी आती थी. किए-कराए पर पानी फेरना आता था. जले पर नमक छिड़कना आता था. तुम हाथ लगी तो पता चला इन गुणों से तुम्हें मिलाकर पेट भी भरा जा सकता है. तुम न होतीं तो जाने कितने लड़के घर से निकलने की हिम्मत न जुटा पाते. कितने सपनों की ‘बाहर कितने दिन खाएगा?’ सरीखे सवालिया औजारों से भ्रूण-हत्या कर दी जाती. कितने तो मेस के आलू-मटर में मटर तलाशते खेत रहते.


तुम हाथ लगीं तो लगा हम पीसीओ से स्मार्टफोन में आ गए. अब मांएं हमें हर शाम लौकी की सब्जी नहीं खिला सकती थीं. अब हमें नाश्ते में एक प्लेट पोहे बनवाने के लिए नकचढ़ी बहनों के सामने रिरियाना नहीं पड़ता था. मेस की थाली में पनियल दाल में दाल तलाशने के लिए डूबना नहीं पड़ता था. हमें पता था एक पैकेट मैगी रखी है हम उससे भूख मिटा सकते हैं. पेट भर सकते हैं. जान बचा सकते हैं.


एग्जाम के दिनों में हम रात-रात भर पढ़ते और तुम रात-रात भर पकती. मैंने नौकरी की. सेक्टर-सेक्टर दिल भटका. ब्लॉक-ब्लॉक पर आह भरी. वहां भी तुम पीछे खड़ी नजर आई. दिलासा देती, पुचकारती. घर पहुंचो मैं हूं न!


हर सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है मेरे पीछे तुम्हारा पैकेट था. पर हर भली चीज का एक अंत होता है. वो कहते हैं तुममें MSG ज्यादा है, लेड ज्यादा है, लाख बातें कहते हैं, पर मानता कौन है? कहने वाले कहते हैं तुम्हें खाएंगे तो मर जाएंगे. वो नही समझते कि न खाकर जीना भी कौन सा जीना है? वो तुम्हें बैन करने को कहते हैं. शायद कर भी दें फिर तुम दिखो न दिखो. शायद तुम हमारी जिन्दगी मुश्किल बना रही हो पर तुम्हारे बिना भी जिन्दगी आसान न होगी.


पर दिल कहता है, ये साजिश है तुम्हारे खिलाफ. मेरे खिलाफ, हर उस लड़के के खिलाफ जिसने किचन में खड़े होने की हिम्मत दिखाई. जिसने वो बेड़ियां तोड़ीं जो ‘दूध उबालना तक तो आता नही’ कहकर कस दी जाती थीं. उस लड़के के खिलाफ जिसने आग लगाई, एक भगोने में पानी उबाल रसोई के सारे नियम बदल दिए. ये साजिश है उन तमाम मांओं की जो चाहती हैं हम सुबह-शाम सिर्फ लौकी-गिलकी खाएं. उन तमाम नकचढ़ी बहनों का जो एक प्लेट पोहे के बदले दसियों बार बाजार दौड़ा हमसे दुपट्टे के मैचिंग का धागा मंगाना चाहती हैं. इस साजिश में प्रधानमंत्री भी शामिल हैं. वो तो चीन गए थे, फिर नूडल्स पर बैन क्यों? यही है विदेश नीति? यही हैं अच्छे दिन? सवाल बहुत हैं जवाब नही, तुम भी नही. बस एक मैं हूं.


तुम्हारा,
भूखा लड़का

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

उत्तर प्रदेश: MSMEs के लिए अच्छा मौका, जानें सरकार की नई स्कीम में कैसे मिल रहा है फायदा


नई दिल्ली. इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स के निर्माण क्षेत्र के छोटे एवं मध्यम उद्यमियों(MSMEs) के लिए उत्तर प्रदेश में अच्छे अवसर हैं। उत्तर प्रदेश सरकार इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी 2014 लेकर आ रही है। इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी यूपी में स्थापित इकाइयों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में मदद करेगा।
 
फिलहाल यूपी सरकार ने इलैक्ट्रॉनिक पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग के लिए तीन जगह देखी हैं, जहां इकाइयों को स्थापित किया जा सकता है। सरकार की ओर से तलाशे गए सबसे महत्वपूर्ण इलाके में ग्रेटर नोएडा है। इसके अलावा, दो और समूहों में इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए यूपी में ही स्थापित किए जाएंगें। जिनमें से एक आगरा को जोड़ने वाले यमुना एक्सप्रेस वे इंडस्ट्रियल एरिया में स्थापित करने की प्लानिंग है। 
 
एनसीआर(NCR) रीजन में इलेक्ट्रॉनिक इकाइयों को स्थापित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्रियल एसोसिएशन ऑफ इंडिया(ELCINA) पिछले कुछ समय से यूपी सरकार के संपर्क में है। Moneybhaskar.com से बातचीत करते हुए एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी राजू गोयल ने कहा, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग के लिए ग्रेटर नोएडा एक बेहतर जगह है। इससे इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों में अच्छे अवसर मिलेंगे। साथ ही एमएसएमई भी इंडस्ट्री स्थापित करने के लिए आगे आएंगे।
 
इलेक्ट्रॉनिक गुड्स को सेल करने के लिए मार्केट के पास ही 100 एकड़ की जमीन देखी गई है। जिसमें ये इकाइयां स्थापित की जा सकेंगी। राजू के मुताबिक सरकार पहले ही ग्रेटर नोएडा में इकाइयों को स्थापित करने के लिए ऐसी जगह तलाश चुकी है। इसके अलावा, पॉलिसी से मोबाइल डिवाइसेस, टेलीकॉम प्रोडक्ट्स, कनज्यूमर्स इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स, इंडस्ट्रियल इलेक्ट्रॉनिक्स, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी सिस्टम और हार्डवेयर के निर्माण उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।
 
सब्सिडी भी करेगी एमएसएमई(MSMEs) को मदद
 
  • नई इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी के तहत यूपी सरकार 7 साल के लिए 15 प्रतिशत पूंजीगत सब्सिडी और ब्याज सब्सिडी प्रदान कर रही है। 
  • उत्तर प्रदेश में लघु उद्योगों के लिए स्टाम्प ड्यूटी पर 100 प्रतिशत छूट होगी।
  • पॉलिसी के तहत पेटेंट के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फाइलिंग की वापसी की जाएगी।
  • नई नीति के तहत 10 साल के लिए वैट/सीएसटी पर 100 प्रतिशत टैक्स वापसी होगी।
  • भूमि खरीद पर भी एमएसएमई को प्रचलित क्षेत्रों की दरों पर 25 फीसदी की छूट मिलेगी। साथ ही, मौजूदा इकाइयों के लिए औद्योगिक संवर्धन सब्सिडी भी दी जाएगी।
  • 200 करोड़ रुपए तक का निवेश करने वाली इकाइयों के लिए विशेष प्रोत्साहन पैकेज पर भी पॉलिसी के तरत विचार किया जाएगा।
  • बुनियादी सुविधाओं के विकास को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार भी इन ईएमसी (EMC) को केंद्र की नेशनल पॉलिसी ऑन इलेक्ट्रॉनिक्स, 2012 के तहत दी जाने वाले 50 फीसदी अनुदान के बराबर सब्सिडी प्रदान करेगी।
योजना से कैसे मिलेगा एमएसएमई को लाभ
 
सरकार द्वारा गठित की गई इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग योजना ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड दोनों क्लस्टर को स्थापित होने में मदद करेगी। भारत में बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए भी योजना काफी लाभदायक है। फिलहाल, योजना की वैधता अक्टूबर, 2017 तक रखी गई है।
 
इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री
 

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री का कम्पाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 2015 तक 9.9 प्रतिशत की दर से 94.2 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।


रविवार, 6 अप्रैल 2014

तुम....सातवां पन्ना

तुम....


 झरनों के संगीत में हो तुम...
नदियों के हर गीत में हो तुम...
सूरज की चाहत में पागल...
सूरजमुखी की प्रीत में हो तुम...
हां तुम! बस तुम!

मेरी सुबहो-शाम में हो तुम...
मेरे हर एक काम में हो तुम...
मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे...
ईश्वर, अल्ला, राम में हो तुम...
हां तुम! बस तुम!

जीने के हर ढंग में हो तुम...
खुशियों के हर रंग में हो तुम...
हार में हो, हर जीत में हो...
मेरी हर इक जंग में हो तुम...
हां तुम! बस तुम!


शुभम् शुक्ला

तू क्यों समझती नहीं... ये दिल है सिर्फ तेरा...

जब आंखें बंद होती हैं..

बस तू साथ होती है..
तेरी यादों के तकिए पर,
बस रात मेरी सोती है..
तू क्यों दूर है यूं मुझसे..
तूझे चाहता हूं पूरे दिल से..
सुन ले मेरी आरजू तू..
तू ही मेरी जान है..
तू ही मेरा जहान है...
तू ही है सबकुछ मेरा..
अधूरा तेरे बिना दिल ये मेरा..
तू क्यों समझती नहीं...
ये दिल है सिर्फ तेरा...

शुभम् शुक्ला