रविवार, 3 फ़रवरी 2013

कोशिशें नाकाम नहीं होती..ये सुना था और कोशिश करके अच्छा भी लगता है...लेकिन एक बात नहीं समझा कि किन हालातों में कोशिश करनी चाहिए। मैं अपने निजी जीवन की बात कर रहा हूं। आज ऐसे दोहराया पर खड़ा हूं कि न आगे जा पा रहा हूं औऱ न पीछे। नियति कैसी है और क्या कराएगी मुझे नहीं पता। बस इतना जानता हूं कि मैं या तो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हूं या फिर एक नया कल यहां से शुरू होने वाला है। बस इंतजार है तो उसका और उसके हां करने का। अभी तक कोई बात नहीं हुई उससे, लेकिन उसके बिना मानों जीवन अधूरा सा लगने लगा है। बहुत हिम्मत कर अपने बेहद करीबी को बताई तो मैंने अपने दिल की बात, लेकिन वहां से भी कुछ बेहतर होने की आशा नहीं बनी। बल्कि एक और नया सवाल खड़ा हो गया। खैर उसका नाम लेकर मै उसे चोट नहीं पहुंचाना चाहता। बस हकीकत में उसे अपने साथ देखना चाहता हूं। मेरी ख्वाहिश है उसके साथ अपना जीवन गुजारने की। हालांकि शायद मेरा परिवार साथ न दे। इंटरकास्ट....लेकिन भगवान पर भरोसा है। उससे जो मांगा है सच्चे दिल से शायद वह मुझे वो नसीब हो। लेकिन कोशिश करते हुए भी आज अपने आप को हारा महसूस कर रहा हूं। वो भी तब जब दो दिन तक उसके आसपास था और कहने को कुछ शब्द ही नहीं थे। शायद मैं उसे ठीक से समझा ही नहीं पाया हूं। अब सबकुछ मेरी करीबियों पर है। उन्हें भी शायद अजीब लगा हो, लेकिन हकीकत से कब तक भागता। किसी से अपने भीतर की टीस को कह नहीं सकता। इसलिए लिखने से ही अपना दर्द कम करने की कोशिश कर रहा हूं। आखिर क्यों वो सबकुछ समझते हुए भी कुछ कहने को तैयार नहीं है। क्यों शायद वो जानते हुए भी अनजान है। मैं उसे कैसे बताऊं सात साल से एक ही चेहरा आंखों के आगे और हमेशा उसे देखकर एक ऊर्जा सी मिलती रही। कभी उससे भी कुछ नहीं कहा। बस इंतजार करता रहा सही वक्त का। सही मायने तो उसने ही प्रेरित किया मुझे सही राह में जीने के लिए। कभी पढा़ई की ओर ध्यान नहीं दिया, लेकिन कॉलेज में टॉप भी किया तो उसके लिए, ताकी मैं कुछ बन सकु और उसे हासिल करने में मुझे कोई दिक्कत न हो। शायद अभी तक अपने सही पड़ाव पर नहीं पहुंचा हूं, इसलिए उससे कहने या कुछ करने की हिम्मत नहीं है। अपनो शब्दों को विराम दे रहा हूं। थका हूं और आंखें भी नम सी हैं। बस भगवान से दुआ यही है कि उससे मिला दे औऱ कुछ नहीं मांगना। 

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