रविवार, 20 नवंबर 2011

तुम....

लम्हा लम्हा वक्त गुजरता..

पनघठ पर गीत गुनगुनाती तुम..

रोज सुनता गीत तुम्हारे..

अगर शाम होते आती तुम..

मनचली हर एक अदा तुम्हारी..

इठलाती, शर्माती तुम..

क्यूं न मदहोश हो जाऊं मैं..

खुली ज़ुल्फ लहराती तुम..

सुबह की पहली किरण है जागी

काश मुझे रोज जगाती तुम..

अलबली सी बन बैठ मुझे..

कभी हंसाती कभी रूलाती तुम..

कहानियां किस्से बहुत सुने थे..

हकीकत मुझे समझाती तुम..

वक्त न ठहरा पास मेरे वो..

ठहरी मेरे पास थी तुम..

रोज होता दिदार तुम्हारा

आयना वो छोड़ गई थी तुम..

खुद न जागा मैं उन रातों में..

मुझे जगाया जिसने वो थी तुम..

प्यार मैं करता बहुत तुम्हे था..

प्यार करती कतराती तुम...

आज भी सोचता दिल ये मेरा..

काश मेरी हो जाओ तुम..

लम्हा लम्हा वक्त गुजरता..

पनघठ पर गीत गुनगुनाती तुम..

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