भारतीय लोकतंत्र को शरमिंदा करते भारत के ये राजनेता....... आज देश जिन समस्याओं से जूझ रहा है उनमें से... एक हमारे देश की आतंरिक बीमारी...."नक्स्लवाद" है........ आज हमारी सरकार इससे निपटने की बजाये बात के जरीए इस बीमारी का हल निकालने की सोच रही है........ कोई उन्हे समझाए की ऐसा करना क्या अपने आप को ही आधात पहुंचाना नहीं होगा..... जिस बीमारी से निपटा जा सकता है उससे बातचीत करके हल निकालने की सोचना भी अपनी कमजोरी को व्यक्त करना है... हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपनी जनता को भूल उनकी शर्तो को मानने की कोशिश की तो वो और सर पर चढ जाएंगे... बजाय उनके शर्तो को मानना इससे बहतर है कि उनको कत्म किया जाए... मेरी राय में हमारी समस्या का एक समाधान है....."गोली" हिंसा के बदले हिंसा.... नहीं तो ऐसे ही रोज हमारे जवान शहीद होते रहेगें और सरकार कहती रहेगी की हम बात से हल निकालेगें और ये बीमारी इतनी बढी हो जाएगी की एक दिन हम अपने पुराने दिनों को याद करेंगें... कभी अग्रेंजो के गुलाम थे..... फिर माओवादी के गुलाम और इस तरह मिट जाएगा भारत का अस्तीत्व........ फिर भी चलती रहेगी बात, वार्ता, बातचीत, हल...... मैं नमन करता हूं अपने देश के राजनेताओं को..........अब नहीं जागे तो कब जागोगे............. भारत की जनता कहीं फिर गुलाम न हो जाए....... छतीसगढ में हुए सैन्य हमले में हमारे देश के कई जवानो ने अपनी जान की अहुति दे दी पर हमारी सरकार चुप देखती रही..... ये सफेद पोश नकाबधारी हमारे देश और हमारी क्या रक्षा करेगें इन्हें अपनी जेब भरने से फुरसत मिली होती तो आगे कुछ सोचते भी..... इन सफेदपोशियों के लिए कुछ......
ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिरएक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!
शुभम् शुक्ला
पत्रकार
गुरुवार, 8 अप्रैल 2010
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