"अब तो देश फिर वही जकड़ा हुआ कोई गुलाम लगता है"
हम किस दौर में हैं? क्या आप जानते हैं? मैं तो नहीं जानता... क्योंकि, अगर इसी दौर को 21वीं शताब्दी कहते हैं तो शायद ही मैं इस दौर के लायक हूं.. 'अपनी हस्ती को मिटाने की कूबत नहीं मुझमें, मैं इस दौर की धार में बहता रहता हूं' शायद यही हकीकत है. क्योंकि, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होने के बावजूद डर लगता है. आप कुछ नहीं कर सकते. आपके हर कदम पर पहरा है. कोई छुपकर आपको देख रहा है. ये देश नहीं जकड़ा हुआ कोई गुलाम ज्यादा लगता है.
हिंदुत्व की राजनीति, पिछड़े वर्ग की लड़ाई, दलितों को आगे लेकर चलने की दुहाई देने वाली राजनीतिक पार्टियों ने हकीकत में देश के हर परिवार, समुदाय यहां तक की लोगों के विचारों को भी बांट दिया है. लेकिन, क्यों? क्या ये ही न्यू इंडिया की पहल है. जहां कोई अपनी बात रखता है तो देशद्रोही हो जाता है. या फिर उसे यही सोचना चाहिए कि वो इन सफेदपोश डाकुओं की कठपुतली सा हो गया है. बहरहाल, मकसद सिर्फ इतना सा है कि खुद को जगाने की जरूरत है. किसी की हत्या नहीं करनी है, लेकिन ईमान को बचाना है. हम किससे लड़ते हैं, वह भी तो भाई है. हम किस पर अत्याचार का आरोप लगाते हैं. यकीनन विचारों को बेच दिया गया है. कोई भी चीज आपकी सुरक्षित नहीं है. सरकार को आपकी हर चीज की जानकारी होनी चाहिए, वरना वो तो बेनामी हो जाएगी. अब इस दौर को बदलने वाला कोई नहीं है. कोई महात्मा नहीं, कोई पटेल, कोई नहरू नहीं है. अब लड़ाई है कौन कितना गिरेगा और कितना उठेगा. कोई नोटों के बिस्तर पर सोएगा और फकीर की झोली उठाकर वापस चल देगा. सवाल के जवाब मिलेंगे तो कब? अपने विचार लिखिए और सोचिए आप किस दौर में हैं?
हम किस दौर में हैं? क्या आप जानते हैं? मैं तो नहीं जानता... क्योंकि, अगर इसी दौर को 21वीं शताब्दी कहते हैं तो शायद ही मैं इस दौर के लायक हूं.. 'अपनी हस्ती को मिटाने की कूबत नहीं मुझमें, मैं इस दौर की धार में बहता रहता हूं' शायद यही हकीकत है. क्योंकि, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होने के बावजूद डर लगता है. आप कुछ नहीं कर सकते. आपके हर कदम पर पहरा है. कोई छुपकर आपको देख रहा है. ये देश नहीं जकड़ा हुआ कोई गुलाम ज्यादा लगता है.
हिंदुत्व की राजनीति, पिछड़े वर्ग की लड़ाई, दलितों को आगे लेकर चलने की दुहाई देने वाली राजनीतिक पार्टियों ने हकीकत में देश के हर परिवार, समुदाय यहां तक की लोगों के विचारों को भी बांट दिया है. लेकिन, क्यों? क्या ये ही न्यू इंडिया की पहल है. जहां कोई अपनी बात रखता है तो देशद्रोही हो जाता है. या फिर उसे यही सोचना चाहिए कि वो इन सफेदपोश डाकुओं की कठपुतली सा हो गया है. बहरहाल, मकसद सिर्फ इतना सा है कि खुद को जगाने की जरूरत है. किसी की हत्या नहीं करनी है, लेकिन ईमान को बचाना है. हम किससे लड़ते हैं, वह भी तो भाई है. हम किस पर अत्याचार का आरोप लगाते हैं. यकीनन विचारों को बेच दिया गया है. कोई भी चीज आपकी सुरक्षित नहीं है. सरकार को आपकी हर चीज की जानकारी होनी चाहिए, वरना वो तो बेनामी हो जाएगी. अब इस दौर को बदलने वाला कोई नहीं है. कोई महात्मा नहीं, कोई पटेल, कोई नहरू नहीं है. अब लड़ाई है कौन कितना गिरेगा और कितना उठेगा. कोई नोटों के बिस्तर पर सोएगा और फकीर की झोली उठाकर वापस चल देगा. सवाल के जवाब मिलेंगे तो कब? अपने विचार लिखिए और सोचिए आप किस दौर में हैं?
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