डोपिंग या साजिश !
पहलवाल नरसिंह यादव का डोप टेस्ट में फेल होना भारतीय उम्मीदों के लिए तगड़ा झटका है। इससे भारतीय खेल प्रशासन की साख पर भी सवाल उठेंगे। ब्राजील के शहर रियो द जनेरो में 5 अगस्त से शुरू हो रहे ओलिंपिक खेलों के लिए भारतीय दल में यादव का चयन पहले से विवादित था। 74 किलोग्राम वर्ग में दावा दो बार के ओलिंपिक पदक विजेता सुशील कुमार का भी था। पिछले साल लास वेगास में हुई विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर नरसिंह ने रियो का टिकट हासिल किया। मगर इससे सुशील असंतुष्ट थे। तो मामला कोर्ट में गया, हालांकि न्यायपालिका ने टीम चयन में दखल देने से इनकार कर दिया।
अब जबकि नेशनल एंटी-डोपिंग एजेंसी (नाडा) ने नरसिंह के डोप टेस्ट में फेल होने की खबर जारी की है, तो उन्होंने इस घटनाक्रम के पीछे षड्यंत्र का आरोप लगाया है। भारतीय कुश्ती संघ के कुछ सूत्र भी ऐसा शक जता रहे हैं। संकेत यह दिया गया है कि नरसिंह यादव के विरोधी तत्वों ने उन्हें टीम से बाहर कराने की चाल चली। ऐसे इल्जाम लगना किसी खिलाड़ी के डोप टेस्ट में फेल होने से भी अधिक हानिकारक एवं दुर्भाग्यपूर्ण हैं। प्रश्न है कि क्या भारतीय ओलिंपिक संघ अपने खिलाड़ियों की षड्यंत्रकारियों से रक्षा करने में अक्षम है? क्या नाडा षड्यंत्र में शामिल या उसका शिकार होता है? ऐसी धारणा बनना भी भारतीय खेलों के लिए घातक होगा। भूलना नहीं चाहिए कि रियो ओलिंपिक रूस में हुए डोपिंग घोटाले के साये में आरंभ होने जा रहा है।
वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी (वाडा) की जांच से जाहिर हुआ कि मैदान पर प्रदर्शन में इजाफे के लिए रूस में संगठित ढंग खिलाड़ियों को प्रतिबंधित दवाएं दी जाती थीं। तब इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशंस (आईएएएफ) ने रूसी एथलेटिक्स फेडरेशन को निलंबित कर दिया। नतीजतन, रियो ओलिंपिक के एथलेटिक्स मुकाबलों में रूसी खिलाड़ी अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकेंगे। वाडा ने रूस के सभी खिलाड़ियों और अधिकारियों को रियो ओलंपिक से बाहर करने की मांग की है। अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति का इस पर फैसला अभी आना है।
बहरहाल, ये साफ है कि रूसी खेल प्रशासन की विश्वसनीयता तार-तार होने की कितनी भारी कीमत वहां के खिलाड़ियों को चुकानी पड़ रही है। सबक है कि राष्ट्रीय खेल प्रशासनों की स्वच्छता और ईमानदारी बेदाग बनी रहनी चाहिए। नरसिंह यादव ने जाने-अनजाने में प्रतिबंधित दवाएं लीं, तो यह अपने आप में बुरी खबर है। इससे ओलिंपिक शुरू होने के पहले ही भारत के एक पदक की आस टूटने का खतरा पैदा हुआ है। लेकिन यदि यह सामने आया कि उनके विरोधी उन्हें फंसाने में सफल हो गए, तो यह भारतीय खेल प्रशासन के माथे पर लगा अमिट कलंक होगा। (दोनों ही स्थितियों में) दोषी कौन है, उसकी पहचान और उसकी जवाबदेही जरूर तय की जानी चाहिए।
पहलवाल नरसिंह यादव का डोप टेस्ट में फेल होना भारतीय उम्मीदों के लिए तगड़ा झटका है। इससे भारतीय खेल प्रशासन की साख पर भी सवाल उठेंगे। ब्राजील के शहर रियो द जनेरो में 5 अगस्त से शुरू हो रहे ओलिंपिक खेलों के लिए भारतीय दल में यादव का चयन पहले से विवादित था। 74 किलोग्राम वर्ग में दावा दो बार के ओलिंपिक पदक विजेता सुशील कुमार का भी था। पिछले साल लास वेगास में हुई विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर नरसिंह ने रियो का टिकट हासिल किया। मगर इससे सुशील असंतुष्ट थे। तो मामला कोर्ट में गया, हालांकि न्यायपालिका ने टीम चयन में दखल देने से इनकार कर दिया।
अब जबकि नेशनल एंटी-डोपिंग एजेंसी (नाडा) ने नरसिंह के डोप टेस्ट में फेल होने की खबर जारी की है, तो उन्होंने इस घटनाक्रम के पीछे षड्यंत्र का आरोप लगाया है। भारतीय कुश्ती संघ के कुछ सूत्र भी ऐसा शक जता रहे हैं। संकेत यह दिया गया है कि नरसिंह यादव के विरोधी तत्वों ने उन्हें टीम से बाहर कराने की चाल चली। ऐसे इल्जाम लगना किसी खिलाड़ी के डोप टेस्ट में फेल होने से भी अधिक हानिकारक एवं दुर्भाग्यपूर्ण हैं। प्रश्न है कि क्या भारतीय ओलिंपिक संघ अपने खिलाड़ियों की षड्यंत्रकारियों से रक्षा करने में अक्षम है? क्या नाडा षड्यंत्र में शामिल या उसका शिकार होता है? ऐसी धारणा बनना भी भारतीय खेलों के लिए घातक होगा। भूलना नहीं चाहिए कि रियो ओलिंपिक रूस में हुए डोपिंग घोटाले के साये में आरंभ होने जा रहा है।
वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी (वाडा) की जांच से जाहिर हुआ कि मैदान पर प्रदर्शन में इजाफे के लिए रूस में संगठित ढंग खिलाड़ियों को प्रतिबंधित दवाएं दी जाती थीं। तब इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एथलेटिक्स फेडरेशंस (आईएएएफ) ने रूसी एथलेटिक्स फेडरेशन को निलंबित कर दिया। नतीजतन, रियो ओलिंपिक के एथलेटिक्स मुकाबलों में रूसी खिलाड़ी अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकेंगे। वाडा ने रूस के सभी खिलाड़ियों और अधिकारियों को रियो ओलंपिक से बाहर करने की मांग की है। अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति का इस पर फैसला अभी आना है।
बहरहाल, ये साफ है कि रूसी खेल प्रशासन की विश्वसनीयता तार-तार होने की कितनी भारी कीमत वहां के खिलाड़ियों को चुकानी पड़ रही है। सबक है कि राष्ट्रीय खेल प्रशासनों की स्वच्छता और ईमानदारी बेदाग बनी रहनी चाहिए। नरसिंह यादव ने जाने-अनजाने में प्रतिबंधित दवाएं लीं, तो यह अपने आप में बुरी खबर है। इससे ओलिंपिक शुरू होने के पहले ही भारत के एक पदक की आस टूटने का खतरा पैदा हुआ है। लेकिन यदि यह सामने आया कि उनके विरोधी उन्हें फंसाने में सफल हो गए, तो यह भारतीय खेल प्रशासन के माथे पर लगा अमिट कलंक होगा। (दोनों ही स्थितियों में) दोषी कौन है, उसकी पहचान और उसकी जवाबदेही जरूर तय की जानी चाहिए।
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