बुधवार, 3 जून 2009

इतनी तेज रफ्तार से चल रही यह दुनियाइतनी जल्दी-जल्दीअपने रंग बदल रही यह दुनियाकि सुबह जगने के बादपिछली रात का सोना भीलगता है समय की पटरी से उतर जानारोज दिनारम्भ से पहलेन किसी से कुछ कहना न किसी की सुननाएक कप चाय के सहारेघंटा आधा घंटा मेरा चुप रहनाबेतहाशा भागती हुई इस दुनिया के साथएक काम चलाउ रिश्ता बनाने के प्रयास हैं मात्रयों मैं जानता हूँकि मेरी गाड़ी छूट चुकी है पिछली रात को हीमुझे पता है कि मेरे लिए कोई आरक्षित सीट नहींपर आदतन यों हीरोज सुबह के स्टेशन पर खड़ा होकरमैं करता हूँ उसकी प्रतीक्षारोज-रोज की यह प्रतीक्षामेरे घर से शहर की ओर जानेवाली एक बैलगाड़ी का नाम हैजिस पर मैं अपने बाल-बच्चे कपड़ा-बस्तर बर्तन-बासनलस्तम-पस्तम के साथ सवार होकरजीवन के पर्यटन पर निकला हूँ

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